रविवार, 18 जून 2017

शिक्षा का गिरता स्तर, जिम्मेदार कौन ?

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🔴 शिक्षा का गिरता स्तर जिम्मेदार कौन

लेखक : कैलाश मंडलोई

⬇शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक इस प्रक्रिया से गुजरता हुआ कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। अगर हम शिक्षा की तमाम परिभाषाओं को एक साथ रख दें और फिर कोई शिक्षा का अर्थ ढूंढे़ तो भी हमें कोई ऐसा अर्थ नहीं मिलेगा, जो अपने आप में पूर्ण हो। वर्तमान में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली शिक्षा से लिया जाता है।

शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर जो घमासान मचा है, उस परिप्रेक्ष्य में गाँधी, नेहरू और के. टी. शाह के बीच हुई बहस का एक संस्मरण लिखना जरूरी है।

स्वतंत्रता के पूर्व जब जवाहर लाल नेहरू देश की भावी शिक्षा नीति का मसौदा तैयार कर रहे थे, तो गाँधीजी ने के. टी. शाह से पूछा कि आप भावी भारत की शिक्षा कैसी चाहते है? इस पर शाह ने उत्तर दिया कि हम ऐसी शिक्षा चाहते है जिसमें किसी कक्षा में अगर मैं यह सवाल करूँ कि मैंने चार आने के दो सेब खरीदे और उन्हें एक रुपये में बेच दूँ तो मुझे क्या मिलेगा? तो सारी कक्षा एक स्वर में जवाब दे आपको जेल मिलेगी, दो वर्ष का कठोर कारावास मिलेगा। यह उदाहरण हमें यह बताता है कि हमने स्वतंत्रता के पूर्व शिक्षा की किस नैतिकता की अपेक्षा की थी?

किंतु आज शिक्षा शब्द ने अपने अंदर का अर्थ इस कदर खो दिया है कि आज न उसके अंदर का संस्कार जिंदा है और न व्यवहार। शिक्षा अपने समूचे स्वरूप में अराजकता, अव्यवस्था, अनैतिकता और कल्पनाहीनता का पर्याय बन गई है। शिक्षा के जरिये अब न आचरण आ रहा न चरित्र, न मानवीय मूल्य, न नागरिक संस्कार, न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहसे होती है। और अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है, तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य और अयोग्य कैसे हो सकता है? हालांकि काफी हद तक यह बात सही है कि स्कूलों में कुछ शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। स्‍कूल वक्त पर पहुँचते नहीं हैं। शिक्षक वैसा शिक्षण नहीं करते जो गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की श्रेणी में आता है। आये दिन किसी मुद्दे को लेकर हड़ताल पर चले जाना और स्कूलों की छुट्टी हो जाना आम हो गया है। शिक्षार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय जाते हैं, लेकिन वहां शिक्षक ही नदारद रहते हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न लगना लाजिमी है।

लेकिन यह बात भी सही है कि बहुत से शिक्षक हैं, जो ईमानदारी से पढ़ा रहे हैं। उनके बच्चों में शैक्षिक गुणवत्ता की दक्षताएं हैं। फि‍र सभी शि‍क्षकों दोषी कैसे ठहराया जा सकता है।

उद्देश्यों और मूल्यों का सवाल आते ही कई लोग आदर्शवाद की धारा में बह जाते हैं। वे उन भौतिक परिस्थितियों को भूल जाते हैं जिनसे उद्देश्यों पर अमल किया जाना है, जिनमें मूल्यों को जीवन में उतारा जाना है। शिक्षा के गिरते स्तर के लिए शिक्षक दोषी हैं या यह शिक्षा व्यवस्था और उसको अपने हित में नियंत्रित-निर्मित करने वाली आर्थिक राजनीतिक शक्तियाँ? गिरते स्तर के लिए उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु शिक्षा से जुड़े घटकों यथा समाज, प्रशासन, शिक्षक पाठ्यक्रम स्वयं छात्र इत्यादि पर एक दृष्टि डालना उचित होगा।

शिक्षा के गिरते स्तर के कारण उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होना लाजिमी है। लेकिन इस बात के जिम्मेदार कौन लोग है। इस ओर न तो राजनीतिक मंथन हो रहा और न ही सामाजिक चिंतन किया जा रहा है। बातें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की अक्‍सर सुनने में आती है। किन्तु सुधार कहीं नजर नहीं आता।

कुछ दिनों से शिक्षा विभाग में बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर संकुल स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा एक नाटक खेला जा रहा है। इसमें बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता की जाँच की जा रही है, टेस्ट ले रहे हैं। वह भी कैसे की जो स्कूल 45 प्रतिशत उत्‍कृष्ट घोषित हैं, उनके शिक्षकों को बेसलाइनटेस्ट हेतु पेपर दिये। इसमें दो टेस्ट थे। प्रत्येक टेस्ट में भाषा, गणित और अंग्रेजी की लगभग सभी मूलभूत दक्षताओं पर प्रश्‍न थे। और कहा कि‍ कल प्रथम टेस्ट लेना व परसों अंतिम टेस्ट और आपको प्रथम टेस्ट के बाद अंतिम टेस्ट में बच्चे की गुणवत्ता में सुधार भी बताना है। यह कैसे और कहाँ तक संभव है? शिक्षकों पर दबाव डाला जा रहा है कि उनका स्कूल गुणवत्ता पूर्ण की श्रेणी में आ जाए। जिले, विकास खण्ड, संभाग और राज्य स्तर तक के शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी स्कूलों में जा रहे हैं और निरीक्षण कर रहे हैं। अधिकारी शिक्षकों को फटकारनुमा समझाइश देते हैं कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करें। यह कैसी विडंबना है कि स्कूलों में शिक्षक पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा स्थापित करने का भारी दबाव तो है, मगर उसके लिए तैयार ही नहीं किया गया। उल्टे शिक्षकों को प्रतिमाह प्रशिक्षण के बहाने कक्षा शिक्षण से दूर करने की साजिश रची जा रही है। इसके तहत देश की भोली भाली जनता को यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि शासन को उनके बच्चों की खूब परवाह है। लेकिन उनके जो शिक्षक हैं, वे सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण उनके बच्चे शैक्षिक गुणवत्ता में पिछड़ रहे हैं। सरकार की गलत शिक्षा नीतियों के जो दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं, उनमें सुधार करने कि बजाय इसका ठीकरा शिक्षकों के सिर फोड़ा जा रहा है। यह कहाँ तक उचित है? सरकार दोष देने के बजाय शिक्षकों को क्षमतावान बनाए।’’ यह कहना है शैक्षिक कार्यकर्ता कालूराम शर्मा जी का।

आज इस बात पर भी गौर करना है कि जिन बच्चों की शिक्षा के बारे में सरकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की बात कर रही है, वे बच्चे किस तबके से आते हैं? उनकी सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, शैक्षिक स्थिति के साथ स्वास्थ्य की स्थिति क्या है? क्या ये कारक इन बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे है? यदि हाँ तो फिर सरकार और उनके ये उच्च अधिकारी इस बारे में क्या सोचते हैं और क्या कर रहे हैं?

आज यह स्पष्ट हो चुका है कि सरकार की दोषपूर्ण शिक्षा नीति के साथ सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। वर्षभर शासकीय शिक्षकों से कई प्रकार के गैर शैक्षिक कार्य लिए जा रहे हैं, जिससे वे अपने छात्रों को पूरा समय नहीं दे पाते और उनके छात्र पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। निजी विद्यालय बुनियादी सुविधाओं का उचित प्रबंध रखते हैं। श्री सतीशचन्द्रा के अनुसार, ‘‘आज सरकारी और निजी विद्यालयों में फर्क बहुत साफ नजर आता है। दोनों की पढ़ाई के स्तर में जमीन आसमान का अन्तर है। इसकी एक वजह सरकारी विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के पास अधिकारों का अभाव है। निजी विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के पास असीमित अधिकार होते है।’’ यह शिक्षा के निजीकरण का नकारात्मक पहलू भी है। आज हालात यह है कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं। लोगों का अंग्रेजियत का मोह और साथ ही प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ के कारण 70 से 80 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में दर्ज हो गए हैं।

सरकारी विद्यालय की शिक्षा की आलोचना दलित चिंतक चन्द्रभान प्रसाद भी करते हैं। वे कहते है, ‘‘आज गरीब से गरीब आदमी से बात कीजिए, चाहे वह रिक्शा चालक हो, रेहड़ी लगाता हो या दिहाड़ी मजदूरी करता हो, इनमें से कोई भी अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में नहीं पढ़ाना चाहता। सभी निजी विद्यालयों की ओर भाग रहे हैं, वह भी अंग्रेजी माध्यम की ओर। सर्व शिक्षा अभियान योजना के माध्यम से स्कूल न जाने वाले बच्चों का रुझान स्कूलों की तरफ होना यह साबित करता है कि शिक्षा पाने के लिए हर कोई गंभीर है। लेकिन शासकीय व्यवस्था को देखकर लोगों का मोह भंग हो रहा है। जिससे पैसे वालों के बच्चे निजी स्कूलों मे पढ़ाई करते है। शिक्षा के निजीकरण ने समाज के उच्च वर्गो के स्वार्थ के लिए अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का काम किया है। आज सरकारी स्कूल में समाज के सबसे पिछड़े व अति गरीब वर्ग के बच्चे ही सरकारी शिक्षा का अभिशाप झेलने के लिए विवश हैं।

गौर करने वाली बात है कि जब हमारे देश में शिक्षा के बीच खाईं बनी हुई है, तो उससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होगा। एक तरफ सरकार शिक्षा में सुधार की योजनाएं बनाने में दिलचस्पी दिखाती है, तो दूसरी ओर योजनाओं के सही क्रियान्वयन की ओर कोई सकारात्मक पहल क्यों नहीं की जाती है? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा  का ग्राफ दिन प्रतिदि‍न नीचे की ओर जायेगा। सरकार शिक्षा में किए जा रहे भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाये तो शिक्षा की गुणवत्ता कायम हो सकती है।

बहरहाल, यदि गरीब का बच्चा सरकारी विद्यालय जाता है और उसे सही शिक्षा नहीं दी जाती है और वह शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद अनपढ़ रह जाता है, तो यह सरकार के लिए एक वि‍चारणीय प्रश्न है। सबसे अहम बात यह है कि सरकार शिक्षा में किये जा रहे भेदभाव को मिटाने की ओर पहल करे। देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू हो। सभी के लिए एक जैसा पाठ्यक्रम हो जिससे देश में समरसता का वातावरण बने और शिक्षा के निजीकरण ने अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का जो काम किया है, वह कम हो सके।

Aks टीम द्वारा प्रेषित

एक गंभीर संकेत

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🔵 एक गंभीर संकेत

लेखक : अनुराग

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पिछले दिनों समाचार पत्रों में लंदन की एक खबर प्रकाशित हुई कि ‘द फेबुलस बेकर्स’ के सर्वे में बच्चों ने बताया कि पेड़ पर उगती हैं चॉकलेट और फ्रिज से निकलती है स्ट्रॉबेरी। चौंकाने वाली बात यह भी है कि ब्रिटेन का हर दस में से एक बच्चा यही सोचता है कि कई फल पेड़ों पर नहीं, बल्कि कारखाने में बनते हैं।

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प्रसिद्ध मफिन फर्म ‘द फेबुलस बेकर्स’ ने हाल ही में छह से दस साल की आयु वर्ग के एक हजार बच्चों के बीच यह सर्वे कराया था। इस सर्वे के नतीजे बेहद दंग कर देने वाले हैं।

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सर्वे के अनुसार दस में से एक बच्चे का मानना था कि सेब पेड़ पर नहीं उगते।

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चार में से एक यह समझता है कि स्ट्रॉबेरी जमीन के अंदर उपजती है। 10 में से एक ने जवाब दिया कि ये पेड़ पर उगते हैं, जबकि कुछ ने कहा, ये फ्रीज से बाहर आते हैं।

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बच्चों को लगता है कि चॉकलेट पेड़ों पर उगती हैं।

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शहद गाय से मिलता है।

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एक-चौथाई से ज्यादा को यह नहीं मालूम था कि केला पेड़ पर उगता है।

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10 में से एक ने बताया कि अंगूर लताओं से नहीं, बल्कि पेड़ से चुने जाते हैं।

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बच्चे सबसे ज्यादा तरबूज को लेकर भ्रमित हुए। कइयों का मानना था कि यह पानी भरा फल जमीन के अंदर, पेड़ों या झाड़ियों पर उगता है।

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हालांकि इस पर थोड़ा संतोष किया जा सकता है कि आम को लेकर सबसे ज्यादा सही जवाब मिले और बच्चों ने बताया कि यह पेड़ पर उपजता है।
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यह सर्वे रिपोर्ट पढ़कर किसी का मन यह सोचकर मुस्करा सकता है कि बच्चों के जवाब कितने मजेदार और मासूमियत भरे हैं। मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था। लेकिन क्षण भर में ही मेरा मन अवसाद से भर गया कि हम बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं कि वह इतनी मामूली सी बात भी नहीं जानते कि फल पेड़ों पर लगते हैं, न कि कारखानों में बनते हैं।
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शिक्षा का यह झोल केवल ब्रिटेन का नहीं है। भारत में बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा का भी कमोबेश यही हाल है। बच्चों को ग्लोबल बनाने के नशे में हम उन्हें आसपास की दुनिया से काटते जा रहे हैं। जिस तरह की तथाकथित कान्वेंटी शिक्षा का प्रचलन भारत में बढ़ता जा रहा है, उसमें तो आस-पास की दुनिया को जानने-समझने के अवसर खत्म होते जा रहा हैं।

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बच्चा सुबह उठेगा, बस या कार से स्कूल जाएगा, वहां पाठ्यक्रम की पुस्तकों से जुझता रहेगा, घर वापस आकर होमवर्क का दबाव, बाकी बचा समय कंप्यूटर और टेलीविजन को समर्पित। पढ़ाई पूरी करके कोई डिग्री और अधिक से अधिक का पैकेज। ऐसे में आसपास की दुनिया को जानने-समझने की न तो कोई गुंजाइश है और न ही बच्चा इसकी जरूरत महसूस करता है।

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माता-पिता भी इससे खुश रहते हैं कि उनका बच्चा अमेरिका के राज्यों के नाम जानता है और उसे पता है कि दुनिया का सबसे बड़ा झराना कहां है या माइकल जैक्सन के जीवन में क्या-क्या विवाद जुड़े हुए हैं।
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इस शिक्षा का दुष्परिणाम यह भी है कि जब बच्चे के मन में ग्लोबल ज्ञान ठूंसा जा रहा है, तो उसकी सपनों की दुनिया भी तो उसी ग्लोब का हिस्सा बनती है। यही वजह है कि जैसे-जैसे बच्चा उच्च शिक्षा की सीढ़ी चढ़ता जाता है, उसे अपने देश में बदबू आने लगती है और कमियां ही कमियां दिखाई देने लगती हैं। नतीजा यह होता है कि वह शिक्षा पूरी करते है ही अमेरिका, कनाडा आदि की ओर रुख कर लेता है। जिन चीजों के बारे में बच्चे को पढ़ाया और समझाया जाएगा, लगाव भी उसका उन्हीं से होगा।
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ब्रिटेन की सर्वे रिपोर्ट हम सबके लिए खतरे की घंटी है। देश में जो शिक्षा का मॉडल अपनाया जा रहा है, उसके बारे में पुनर्विचार किया जाए। उसमें इस तरह का बदलाव किया जाए कि बच्चे के मन में आसपास की दुनिया को जानने की ललक पैदा हो?

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माता-पिता भी थोड़ा समय निकालकर बच्चों को प्राकृतिक स्थलों-नदी, तालाब, खेत, वन क्षेत्र आदि में ले जाएं, तो उन्हें अपने आसपास की दुनिया को जानने-समझने का एक मौका मिलेगा।

प्रस्तुति : aks टीम

गम्भीर सवालों में शिक्षा

🔴 गंभीर सवालों में शिक्षा :

👍🏻लेखक : प्रेमपाल शर्मा

☹कोटा और दूसरे शहरों में आत्महत्या की खबरों को हत्या कहना ज्यादा सही होगा। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी किसी खबर या घटना पर देश के पुरस्कृत लेखक, बुद्धिजीवियों, कलाकारों ने कभी कोई प्रतिक्रिया न दी, न देंगे। इससे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा क्या हो सकता है, जब बच्चे कुछ आरोपित सपनों को पूरा न कर पाने की हताशा में मां-बाप, समाज, दोस्तों की टेढ़ी, व्यंग्य भरी नजरों से भयभीत अपनी ही जान दे देते हैं। बरसों से यह हो रहा है। मगर इस साल तो अति ही हो गई है। अभी तक अकेले कोटा शहर में दो दर्जन आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। मान कर चलिए कि इससे कई गुना ज्यादा होंगे। दूसरे शहरों में भी और जिन्हें लोकलाज से छिपाया भी जाता रहता है।

😡 आखिर दोष किसका है?

👉🏻 बच्चों का तो कतई नहीं।

⏩ वे तो कच्चे मिट्टी हैं जैसा ढालोगे, पकाओगे वैसा ही वे बनेंगे। आत्महत्या से पहले छिपाकर छोड़ी गई पर्चियां दिल दहलाने वाली हैं।

😡 ‘यदि मम्मी सेलेक्शन नहीं हुआ तो किसी से नजरें नहीं मिला पाऊंगी। मैं चाहती थी कि आप मुझ पर गर्व करें।’

😡 एक और पर्ची की इबारत, ‘मां मैं बहुत प्रेशर में था। पापा के पैसे भी बर्बाद हुए। मैं मजबूर हूं।’

⏩कोई और देश होता तो पूरा समाज तंत्र सड़कों पर उतर आता।

बीस बरस पहले लंदन के नजदीक एक बच्चे की स्कूल में लाश मिली थी तो हफ्तों अखबारों में यह मौत सुर्खियों में रही थी।

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यहां पसरी चुप्पी बताती है कि हम सब इन आत्महत्याओं के दोषी हैं। उन्हें उकसाते हैं। दुनिया के सामने हमारे सारे बड़बोले राजनेता इस बात पर तो इतराते हैं कि दुनिया की सबसे नौजवान आबादी भारत में है, लेकिन क्या इन नौजवानों के सपनों को कोई जगह व्यवस्था दे पा रही है?

न पढ़ने के लिए पर्याप्त मेडिकल कॉलेज, न अच्छे इंजीनियरिंग या दूसरे शोध संस्थान।
☹☹☹
आइआइटी जैसे संस्थान कुछ ब्रांड बन गए हैं, लेकिन चौदह लाख परीक्षा देने वाले और सीट मात्र दस हजार। वह भी पिछले कुछ वर्षो में बढ़ी हैं। फिर शेष कहां जाएंगे?

😔😔😔
दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा। बचे हुए कॉलेजों में फीस तो पूरी मगर न शिक्षक, न कोई पढ़ने की सुविधा।

⏩क्यों राज्य दर राज्य सरकारें इतनी नाकारा बन चुकी हैं जो इन कालेजों को ठीक नहीं कर सकतीं, स्कूल तक नहीं चला सकतीं। क्यों कोटा की इन आत्महत्याओं में नब्बे प्रतिशत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों से ही हैं?

☠ दबाव या अपराध मां-बाप का।

🤑जब इंजीनियरिंग की डिग्री में पूछ सिर्फ आइआइटी, एनआइटी की बची है तो बच्चे के कानों पर स्कूल के दिनों से ही गूंजने लगते हैं ये शब्द।

😍 सपनों, महत्वाकांक्षाओं, गर्वीले भविष्य से धकेले जाते ये बच्चे पहुंच तो गए कोटा जैसे कोचिंग संस्थानों में, लेकिन क्या उस माहौल में रातों-रात फिट हो जाना इतना आसान है?

🤖 ये मानवीय आत्माएं हैं, निर्जीव रोबोट नहीं। हर कोशिश के बावजूद हजारों बच्चे हताश, निराश, एकाकीपन के कुएं की तरफ बढ़ते जाते हैं।
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एक अनुमान के अनुसार मेडिकल, इंजीनियरों की कोचिंग ले रहे लगभग बीस प्रतिशत बच्चे पढ़ाई से हटकर इन व्यसनों की गिरफ्त में आ जाते हैं।
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दिन-रात वही गणित, भौतिक, रसायन के फॉर्मूले रटते-रटते मानसिक रोगी भी कई बच्चे हो चुके हैं।
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यहां शिक्षाविद प्रोफेसर यशपाल की वर्ष 1992 की रिपोर्ट की बातें याद आती हैं। ‘जो बच्चे नहीं चुने जा पाते वे तो पूरी उम्र के लिए कुंठित होते ही हैं, चुने जाने वाले भी इस रटंत पद्वति के चलते बहुत अच्छा नहीं कर पाते। इसका हल पूरी शिक्षा व्यवस्था में ढूंढ़ना होगा और तुरंत।

⏩ आइआइटी की परीक्षा में पिछले दस बरस में दसियों बार अनगिनत परिवर्तन किए गए हैं। कभी दो चरण कभी तीन, कभी आब्जेक्टिव पर जोर तो कभी 12वीं के नंबरों पर। शिक्षा व्यवस्था में जितने डॉक्टर उतनी तरह की दवाइयां, ऑपरेशन, सर्जरी। मंत्री या तो वे हैं जो हॉवर्ड और कैंब्रिज में पढ़े हैं या वे जो जाति, धर्म के आंकड़ों को ही बांच सकते हैं।

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आश्चर्य है कि ये दोनों ही पक्ष चुप्पी साधे हैं। नतीजा-न कोचिंग कम हुई, न दूर-दूर के गांवों, कस्बों से कोचिंग के मक्का-मदीना की तरफ बढ़ता पलायन। बढ़ती आत्महत्याओं से भी शिक्षा के नियंताओं के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, क्योंकि इससे वोटों की फसल पर कोई असर नहीं होगा।
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गनीमत है कि इन्होंने इन आत्महत्याओं में जाति और धर्म की गिनती नहीं की। इससे भी बुरा पक्ष है देश के इन शीर्ष संस्थानों में पहुंचने वाले छात्रों की प्रतिभा पर प्रश्नचिन्ह।

🔰 दुनिया भर से मिल रही रिपोर्ट बता रही है कि ये शीर्ष संस्थान लगातार पिछड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पहले एक वैज्ञानिक पत्रकार का कहना था कि आखिर क्या कारण है कि इन शीर्ष संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों में कल्पनाशीलता, अन्वेषण और रचनात्मकता निरंतर ह्रास पर है।

🔰पिछले वर्ष आइआइटी रुड़की में पहले ही वर्ष में सत्तर छात्रों का फेल होना क्या बताता है? अंग्रेजी का कहर तो है ही, रटंत शिक्षा की सीमाएं भी साफ हैं। फिर भी इनमें पहुंचने की उतावली या हताशा में आत्महत्याएं?

प्रतिस्पर्धा कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में वे बुनियादी परिवर्तन लाने होंगे जो बच्चों को इतना मजबूत बनाएं कि जीवन में किसी एक-दो परीक्षाओं में पास-फेल होना कोई मायने नहीं रखता। डार्विन, आइंस्टीन से लेकर प्रेमचंद, मंटो की वे जीवनियां पढ़ाई जाएं जिनसे ये जान सकें कि स्कूल या प्रतियोगिता में कुछ नंबरों के कम-ज्यादा होने से खास फर्क नहीं पड़ता। और बच्चों से ज्यादा जरूरी है उनके मां-बाप, स्कूल के टीचरों की मानसिकता को बदलना कि तुम अपने नकली सपनों की खातिर क्यों इन लाड़लों की कुर्बानी देने पर तुले हुए हो। दुनिया भर के शिक्षाविद उस शिक्षा के हिमायती रहे हैं जहां बच्चा मस्ती से पढ़े स्कूल आए, न कि स्कूल और इन कोचिंग संस्थानों की कैद में हताश हो। यूरोप, अमेरिका आदि ने शिक्षा व्यवस्था की इस चूहा दौड़ से बचने के लिए ठोस कदम उठाए हैं और इसका फायदा पूरे समाज को मिल रहा है। लेकिन हमारे यहां तो सामाजिक न्याय और विकास के नाम पर वे बातें जारी हैं जिन पर 15वीं सदी भी शरमा जाए।

प्रस्तुति : aks टीम

सोमवार, 15 अगस्त 2016

आप भी हैं intelligent....!

आप भी हैं Intelligent !!!!!!!
 “That person is very intelligent” यह वाक्य हम तब कहते हैं जब हम किसी कीप्रशंसा करते हैं. पर हम में से अधिकतर लोग बुद्धिमान उसी व्यक्ति को समझते हैं जोबहुत पढ़ा लिखा होता है. अपने academics में अच्छे marks लाता है और दी गयी किसी भी problem को तुरंत solve कर लेता है पर शायद ऐसा सोच कर हम बुद्धि के बहुत हीविस्तृत रूप को संकुचित कर देते है. माता- पिता कई बार इस बात को ले कर शर्मिंदाहोते हैं की उनका बच्चा कम अंक ले कर आया है और अपनी सारी ताकत उसे ये समझाने मेंलगा देते हैं की इस दुनिया में अगर कुछ करना है तो अच्छे marks लाओ जबकि शायद वे यहनहीं जानते की ऐसा करके वे अपने बच्चे के जीवन के एक ऐसे पेहलू को उभरने से रोकरहें हैं जो उसकी सफलता का असली कारण हो सकता है. एक ऐसा बच्चा जो किसी competitive exam को clear नहीं कर पाया पर अपने माता पिता की feelings को बहुत अच्छे से समझताहै और उनकी हर आज्ञा का पालन करता है तो क्या ऐसे बच्चे को आप intelligent लोगों की category में नहीं रखेंगे?क्या एक अच्छा गायक बुद्धिमान नहीं,सड़क पर गाड़ी ठीक करनेवाला mechanic या जूते बनाने वाला मोची बुद्धिमान नहीं  या stage पर dance करनेवाला dancer बुद्दिमान नहीं? क्या आप ये सारे काम कर सकतें हैं? शायद आप ये नहींजानते की intelligence भी कई type की होती है जैसे-

1)  Linguistic Intelligence   – इसमें  language, vocabulary  या statements  से related  कार्यों की कुशलता होती है जैसे की writers में .
2) Logical -Mathematical  Intelligence– इसमें तर्क करने याअंकों से related  कुशलता होती है. जैसे की mathematicians या scientists में.
 3) Spatial Intelligence – इसमें figures को मानसिक रूप से change करने कीकुशलता होती है जैसे की pilots , painters  में.
 4) Body -Kinesthetic Intelligence – इसमें body movements से related कुशलताहोती है जैसे की gymnasts  या  dancers  में.
 5) Intrapersonal Intelligence – जिसमे अपने emotions को समझने और monitor करने की ability को रखा गया है.
6) Interpersonal Intelligence – इसमें दूसरे व्यक्तियों की need  तथा भावनाओंको समझने की कुशलता होती है.
 7) Naturalistic Intelligence – यह natural चीज़ों को समझने की ability से related है. जैसे zoologists,mountaineers etc.
 ये सोचना बिल्कुल  ही व्यर्थ होगा की जो व्यक्ति अपने academics में अच्छा कररहा है वो अपने भविष्य में भी अच्छा ही जीवन  व्यतीत करेगा. कई बार ऐसा भी देखा गयाहै की अपने professional life  में सफल  होने के बाद भी लोग अपने personal life में असफल  हो जाते हैं . बल्कि वो व्यक्ति जो पढ़ाई  में कहीं पीछे होता है अपनी personal life में बहुत खुशहाल हो सकता है और उसके साथ लोग ज्यादा enjoy  भी करतेहैं. ऐसे कई व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने स्कूल के दिनों में बहुत अच्छे अंक प्राप्तनहीं किये पर आज पूरी दुनियां उनको जानती है क्यों की उन्होंने अपनी abilities कोपहचाना और अपने सपनों का पीछा करना नहीं छोड़ा. जैसे दुनियां के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर Sachin Tendulkar और Microsoft founder, Bill Gates, जिन्होंने बहुत पहले ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी ,महान वैज्ञानिक Edison  जिनकी माँ नेउन्हें स्कूल से इस लिए बीच में ही निकाल लिया क्यों की teachers  उन्हें slow learner कहते थे, Charles Darwin को कौन नहीं जानता,  जिनके अपने पिता और  teachers उन्हें एक बहुत ही average student consider करते थे  और भी  बहुत सारे प्रसिद्दलोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में अपने grades या marks को importance ना देकर अपनी real ability और अपने dreams पर focus किया.
 
Researches  से ये साबित हो चुका है की जीवन की सफलताओं में IQ ( Intelligence Quotient ) का योगदान सिर्फ 20 % है जबकि EQ  (Emotional Quotient ) का योगदान 80 % होता है. जिन व्यक्तियों में EQ अधिक होता है वे अपने emotions औरदूसरों के emotions को अच्छे से manage  कर पाते हैं और समझ पाते हैं.  ऐसे लोगअपनी personal life में सफल रहते हैं और जीवन की कई परेशानियों को बहुत ही आसानी सेसुलझा लेते हैं.
 आप कितने  intelligent   हैं ये कई बार आपका समाज भी तय करता है जिसमें आपरहते हैं. जैसे की  Western countries  में technological intelligence कोअधिक importance दिया जाता है पर  Eastern countries में Integral intelligence  ( जो सबके साथ अच्छे सम्बन्ध बनाये और  सबसे मिल के रहे) को importance दिया जाता है.
इस दुनिया में रहने वाले हर व्यक्ति को ईश्वर ने ऊपर बताई गयी किसी नकिसी intelligence से ज़रूर सुसज्जित किया है.  हर व्यक्ति में बुद्धि के येसभी पहलू  present  होते हैं पर कोई एक प्रकार अधिक उजागर होता है.इसलिए अपने आप को किसी से भी कम समझने की आवश्यकता नहीं है क्यों की यहदेखना भी एक रोमांच होगा की इन प्रकारों में से आपका सबसे उजागर पहलू कौन सा है.बस ज़रुरत है तो उसे पहचान कर निखारने की.  किसी भी एक प्रकार की बुद्धि  आप कोजीवन में सफल बनाने में उतनी ही कारगर होगी जितनी  की कोई दूसरे प्रकार की.
 तो हुए ना आप अन्यबुद्धिमानों में से एक बुद्धिमान”  

रविवार, 14 अगस्त 2016

स्वतंत्रता दिवस पर भाषण

स्वतंत्रता दिवस पर भाषण 

(इंडिपेंडेंस डे स्पीच)


स्वतंत्रता दिवस भाषण 1 :

मेरे सभी आदरणीय अधयापकों, अभिभावक, और प्यारे मित्रों को सुबह का नमस्कार। इस महान राष्ट्रीय अवसर को मनाने के लिये आज हमलोग यहाँ इकठ्ठा हुए है। जैसा कि हम जानते है कि स्वतंत्रता दिवस हम सभी के लिये एक मंगल अवसर है। ये सभी भारतीय नागरिकों के लिये बहुत महत्वपूर्ण दिन है तथा ये इतिहास में सदा के लिये उल्लिखित हो चुका है। ये वो दिन है जब भारत के महान स्वतंत्रता सेनानीयों द्वारा वर्षों के कड़े संघर्ष के बाद ब्रिटीश शासन से हमें आजादी मिली। भारत की आजादी के पहले दिन को याद करने के लिये हम हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते है साथ ही साथ उन सभी महान नेताओं के बलिदानों को याद करते है जिन्होंने भारत की आजादी के लिये अपनी आहुति दी।
ब्रिटीश शासन से 15 अगस्त 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली। आजादी के बाद हमें अपने राष्ट्र और मातृभूमि में सारे मूलभूत अधिकार मिले। हमें अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिये और अपने सौभाग्य की प्रशंसा करनी चाहिये कि हम आजाद भारत की भूमि में पैदा हुए है। गुलाम भारत का इतिहास सबकुछ बयाँ करता है कि कैसे हमारे पूर्वजों ने कड़ा संघर्ष किया और फिरंगियो कें क्रूर यातनाओं को सहन किया। हम यहाँ बैठ के इस बात की कल्पना नहीं कर सकते कि ब्रिटीश शासन से आजादी कितनी मुश्किल थी। इसने अनगिनत स्वतंत्रता सेनानीयों के जीवन का बलिदान और 1857 से 1947 तक कई दशकों का संघर्ष लिया है। भारत की आजादी के लिये अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले आवाज ब्रिटीश सेना में काम करने वाले सैनिक मंगल पांडे ने उठायी थी।
बाद में कई महान स्वतंत्रता सेनानीयों ने संघर्ष किया और अपने पूरे जीवन को आजादी के लिये दे दिया। हम सब कभी भी भगत सिंह, खुदीराम बोस और चन्द्रशेखर आजाद को नहीं भूल सकते जिन्होंने बहुत कम उम्र में देश के लड़ते हुए अपनी जान गवाँ दी। कैसे हम नेताजी और गाँधी जी संघर्षों को दरकिनार कर सकते है। गाँधी जी एक महान व्यक्तित्व थे जिन्होंने भारतीयों को अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। वो एक एकमात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने अहिंसा के माध्यम के आजादी का रास्ता दिखाया। और अंतत: लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को वो दिन आया जब भारत को आजादी मिली।
हमलोग काफी भाग्यशाली है कि हमारे पूर्वजों ने हमें शांति और खुशी की धरती दी है जहाँ हम बिना डरे पूरी रात सो सकते है और अपने स्कूल तथा घर में पूरा दिन मस्ती कर सके। हमारा देश तेजी से तकनीक, शिक्षा, खेल, वित्त, और कई दूसरे क्षेत्रों में विकसित कर रहा है जोकि बिना आजादी के संभव नहीं था। परमाणु ऊर्जा में समृद्ध देशों में एक भारत है। ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स जैसे खेलों में सक्रिय रुप से भागीदारी करने के द्वारा हमलोग आगे बढ़ रहे है। हमें अपनी सरकार चुनने की पूरी आजादी है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का उपयोग कर रहे है। हाँ, हम मुक्त है और पूरी आजादी है हालाँकि हमें खुद को अपने देश के प्रति जिम्मेदारीयों से मुक्त नहीं समझना चाहिये। देश के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, किसी भी आपात स्थिति के लिये हमें हमेशा तैयार रहना चाहिये।

स्वतंत्रता दिवस भाषण 2 :


यहाँ मौजूद मेरे प्यारे दोस्तों और आदरणीय अध्यापकों को सुबह का हार्दिक नमस्कार। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के इस शुभ अवसर को मनाने के लिये हम सब एकत्रित हुए है। ये दिन हमलोग पूरे उत्साह और खुशी के साथ मनाते है क्योंकि इसी दिन ब्रिटीश शासन से 1947 में भारत को आजादी मिली थी। हमलोग यहाँ 69वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने आये है। सभी भारतीयों के लिये ये बहुत ही महान और महत्वपूर्ण दिन है। कई वर्षों तक अंग्रेजों के क्रूर बर्तावों को भारतीय लोगों ने सहन किया। आज हमलोग लगभग सभी क्षेत्रों में आजाद है जैसे शिक्षा, खेल, परिवहन, व्यापार आदि क्योंकि ये केवल हमारे पूर्वजों के संघर्षों की वजह से संभव हो सका। 1947 से पहले, लोगों पर बहुत पाबंदियाँ थी यहाँ तक कि उनका अपने दिमाग और शरीर पर भी अधिकार नहीं था। वो अंग्रेजों के गुलाम थे और उनके हर हुक्म को मानने के लिये मजबूर थे। आज हम कुछ भी करने के लिये आजाद है उन महान भारतीय नेताओं की वजह से जिन्होंने ब्रिटीश शासन के खिलाफ आजादी पाने के लिये कई वर्षों तक कड़ा संघर्ष किया।
बहुत खुशी के साथ पूरे भारत में स्वतंत्रता दिवस को मनाया जाता है। ये सभी भारतीयों के लिये बेहद महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि ये हमें मौका देता है उन महान स्वतंत्रता सेनानीयों को याद करने का जिन्होंने हमें एक शांतिपूर्ण और खूबसूरत जीवन देने के लिये अपने जीवन की कुर्बानी दे दी। आजादी से पहले, लोगों को पढ़ने-लिखने की, अच्छा खाने की और हमारी तरह सामान्य जीवन जीने की मनाही थी। भारत में आजादी के लिये जिम्मेदार उन कार्यक्रमों का एहसानमंद होना चाहिये। अपने अर्थहीन आदेशों की पूर्ति के लिये अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ गुलामों से भी ज्यादा बुरा बर्ताव किया जाता था।
भारत के कुछ महान स्वतंत्रता सेनानी है नेताजी सुभाष चनद्र बोस, गाँधीजी, जे.एल.नेहरु, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, खुदीराम बोस, चन्द्रशेखर आजाद आदि। ये प्रसिद्ध देशभक्त थे जिन्होंने अपनी जीवन के अंत तक भारत की आजादी के लिये कड़ा संघर्ष किया। हमारे पूर्वजों द्वारा संघर्ष के उन डरावने पलों की कल्पना भी नहीं कर सकते हमलोग। आजादी के वर्षों बाद हमारा देश विकास की सही राह पर है। आज हमारा देश पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक देश के रुप में अच्छे से स्थापित है। गाँधी एक महान नेता थे जिन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह जैसे आजादी के असरदार तरीकों के बारे में हमें बताया। अहिंसा और शांति के साथ स्वतंत्र भारत के सपने को गाँधी ने देखा।
भारत हमारी मातृभूमि है और हम इसके नागरिक है। हमें हमेशा इसको बुरे लोगों से बचाने के लिये तैयार रहना चाहिये। ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने देश को आगे की ओर नेतृत्व करें और इसे दुनिया का सबसे अच्छा देश बनाये।
जय हिन्द।

स्वतंत्रता दिवस भाषण 3 :


दिन के सम्माननीय मुख्य अतिथि, आदरणीय अध्यापकगण, अभिभावक और मेरे प्यारे मित्रों को सुबह का नमस्कार। मैं आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई देता हूँ। हम सभी यहाँ बड़े भीड़ में इकठ्ठा होने का कारण जानते है। इस महान दिन को उत्कृष्ट तरीके से मनाने के लिये हम सभी उत्साहित है। अपने राष्ट्र का 69वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिये हम सभी यहाँ इकठ्ठा हुए है। सबसे पहले हम अपना राष्ट्रीय झंडा फहराते है फिर उसके बाद स्वतंत्रता सेनानीयों के वीरता युक्त कार्य को सलामी देते है। मुझे भारतीय नागरिक होने पर गर्व महसूस होता है। आप सब के समक्ष स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देने का मुझे अच्छा अवसर मिला है। मैं अपने आदरणीय क्लास टीचर को धन्यवाद देना चाहूँगा कि उन्होंने मुझे भारत की आजादी पर आप सबके सामने अपना विचार रखने का मौका दिया।
हम सभी हर साल 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता दिवस मनाते है क्योंकि 14 अगस्त 1947 की रात को भारत को आजादी मिली। भारत की आजादी के तुरंत बाद, नई दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस को पंडित जवाहर लाला नेहरु ने भाषण दिया। जब पूरी दुनिया के लोग सो रहे थे, ब्रिटीश शासन से जीवन और आजादी पाने के लिये भारत में लोग जगे हुए थे। अब, स्वतंत्रता के बाद, दुनिया में भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। हमारा देश विविधता में एकता के लिये प्रसिद्ध है। इसने कई घटनाओं का सामना किया इसके धर्मनिरपेक्षता को परखने के लिये जबकि भरतीय लोग हमेशा अपनी एकता से जवाब देने के लिये तैयार रहते है।
अपने पूर्वजों के कड़े संघर्षों की वजह से हम अपनी आजादी का उपभोग करने लायक बने है और अपनी इच्छा से खुली हवा में साँस से सकते है। अंग्रेजों से आजादी पाना बेहद असंभव कार्य था लेकिन हमारे बाप-दादाओं ने लगातार प्रयास से इसको प्राप्त कर लिया। हम उनके किये कार्य को कभी भूल नहीं सकते और हमेशा इतिहास के द्वारा उन्हें याद करते रहेंगे। केवल एक दिन में सभी स्वतंत्रता सेनानीयों के कामों को हम याद नहीं कर सकते हालाँकि दिल से उन्हें सलामी दे सकते है। वो हमेशा हमारी यादों में रहेंगे और पूरे जीवन के लिये प्रेरणा का कार्य करेंगे। आज सभी भारतीयों के लिये बहुत महत्वपूर्ण दिन है जिसको हम महान भारतीय नेताओं के बलिदानों को याद करने के लिये मनाते है, जिन्होंने देश की आजादी और समृद्धि के लिये अपना जीवन दे दिया। भारत की आजादी मुमकिन हो सकी क्योंकि सहयोग, बलिदान, और सभी भारतीयों की सहभागिता थी। हमें महत्व और सलामी देनी चाहिये उन सभी भारतीय नागिरकों को क्योंकि वो असली राष्ट्रीय हीरो थे। हमें धर्मनिरपेक्षता में भरोसा रखना चाहिये और एकता को बनाए रखने के लिये अलग नहीं होना है जिससे इसे कोई तोड़ न सके और हम पर फिर से राज न कर पाये।
हमें आज कमस खाना चाहिये कि हम कल के भारत के एक जिम्मेदार और शिक्षित नागरिक बनेंगे। हमें गंभीरता से अपने कर्तव्यों को निभाना चाहिये और लक्ष्य प्राप्ति के लिये कड़ी मेहनत करनी चाहिये तथा सफलतापूर्वक इस लोकतांत्रित राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करना चाहिये।
जयहिन्द, जयभारत।

स्वतंत्रता दिवस भाषण 4 :


सभी माननीयों को, आदरणीय अध्यापकगण और मेरे प्यारे सहपाठियों को सुबह का नमस्कार। हमलोग यहाँ पर 69वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिये एकत्रित हुए है। इस खास अवसर पर भाषण देने के लिये मैं बहुत खुश हूँ। मैं अपने क्लास टीचर का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझे अपने देश की आजादी पर मेरे विचार रखने के लिये खास मौका प्रदान किया। स्वतंत्रता दिवस के इस खास मौके पर अंग्रेजी शासन से आजादी पाने के लिये भारतीयों के संघर्ष पर भाषण देना चाहूँगा।
बहुत साल पहले भारत के महान नेताओं ने ‘भाग्यवधु से एक प्रतिज्ञा की थी’ कि वो हमें अपने जीवन के सुखों के त्याग के द्वारा मुक्त और शांतिपूर्ण देश देंगे। आज हम यहाँ बिना किसी डर के और खुशी चेहरों के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाने आए है, केवल हमारे बहादुर पूर्वजों की वजह से। हम सोच नहीं सकते कि कितना कठिन होगा वो समय। हमारे पास अपने पूर्वजों को उनके बहुमूल्य कड़ी मेहनत और बलिदान के एवज में देने के लिये कुछ भी नहीं है। हमलोग केवल उनको और कार्यों को याद रख सकते है तथा राष्ट्रीय कार्यक्रमों को मनाने के दौरान उन्हें सलामी दे सकते है। वो हमेशा हमारे दिल में रहेंगे। सभी भारतीय नागरिकों के हँसते चेहरों के साथ स्वतंत्रता के बाद भारत का नया जन्म हुआ।
ब्रिटीश शासन के शिकंजे से 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। पूरे देश में भारतीय लोग हर साल इस राष्ट्रीय उत्सव को पूरी खुशी और उत्साह के साथ मनाते है। ये सभी भारतीय नागरिकों के लिये एक महान दिन था जब भारतीय तिरंगे को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने नई दिल्ली के लाल किले पर फहराया था।
हर साल राजपथ पर नई दिल्ली में एक बहुत बड़ा उत्सव मनाया जाता है जहाँ प्रधानमंत्री द्वारा झँडारोहण के बाद राष्ट्रगान गाया जाता है। राष्ट्रगान के साथ 21 बंदूकों की सलामी और हेलिकॉप्टर से तिरंगे पर फूलों की बारिश की जाती है। स्वतंत्रता दिवस के दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है हालाँकि हर कोई इसको अपनी जगह से स्कूल, कार्यालय, या समाज में झंडा फहरा कर मनाता है। हमें भारतीय होने पर गर्व होना चाहिये और अपने देश के सम्मान की सुरक्षा के लिये अपना बेहतर योगदान देना चाहिये।
जयहिन्द।