शिक्षा पद्धति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शिक्षा पद्धति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

फ़िनलैंड की शिक्षा पद्धिति नंबर 1 क्यों ?


Posted by : अध्यापक की सोच

भारत में शिक्षा की स्थिति फिनलैंड जैसी कब होगी? 

बहुत से शिक्षाविद यह सवाल पूछते हैं?

दुनिया में शिक्षा पर होने वाला कोई भी विमर्श या सेमीनार फ़िनलैंड का जिक्र किए बिना पूरा नहीं होती। फ़िनलैंड की इस सफलता का रहस्य वहां की संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था में है। शिक्षा के क्षेत्र में फिनलैंड नंबर क्यों है? 

इस सवाल का जवाब खोजने के लिए बहुत सारे देशों के प्रतिनिधि फिनलैंड का दौरा करते हैं।

वर्तमान समय में फिनलैंड गहरे आर्थिक संकट का सामना कर रहा है और नई सरकार शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले आवंटन में कटौती पर विचार कर रही है, ऐसे में वहां शिक्षा के महत्व को लेकर नए सिर से चर्चाओं का दौर गर्म है।

वहां के पूर्व शिक्षा मंत्री पार स्टेनबैक अपने एक लेख में कहते हैं, “शिक्षा के लिए हमारे देश की तारीफ होना एक साधारण बात है। साल दर साल हमने बेहतर प्रदर्शन करते हुए कोरिया, सिंगापुर और जापान जैसे देशों को पीछे छोड़ा है।”

फ़िनलैंड की सफलता का रहस्य

वह अपने लेख में वे बताते हैं कि फ़िनलैंड के शानदार अधिगम स्तर (लर्निंग रिजल्ट) के मुख्यतौर पर तीन कारण हैं

1. हमारी संस्कृति में शिक्षा और सीखना दोनों को बेहद सम्मानित स्थान हासिल है। 19वीं शताब्दी में फ़िनलैंड ने आज़ादी के बाद सबके लिए शिक्षा  (एज्यूकेशन फ़ॉर ऑल) में निवेश के माध्यम से एक राष्ट्रीय पहचान बनाई और उसे सुरक्षित रखा। इस तरह से आगे के विकास को रास्ता देने के लिए नींव पहले से तैयार थी।

2. दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण है ‘कोई बच्चा छूटे नहीं’ (“Leave no child behind”) का नारा। अमरीका में इस नारे के लोकप्रिय होने से काफ़ी पहले फ़िनलैंड के स्कूलों में इस स्लोगन को आत्मसात कर लिया गया। इसके कारण सीखने में परेशानी का सामना करने वाले छात्रों को शिक्षकों और सहायकों की तरफ़ से उनके बाकी सहपाठियों के औसत स्तर पर लाने का प्रयास किया गया। जो ऐसे बच्चों पर अतिरिक्त ध्यान देते ताकि बाकी बच्चों की तरह उनका अधिगम स्तर (लर्निंग लेवल) बेहतर किया जा सके।

3. इस तरह की सफलता हासिल करने के लिए आपको उच्च गुणवत्ता वाले संवेदनशील शिक्षकों की जरूरत होती है। शिक्षा के क्षेत्र में अप्लाई करने वालों में मात्र 11 फ़ीसदी लोगों का चुनाव बतौर शिक्षक होता है, इसका मतलब है कि सबसे ज्यादा उत्साही लोगों का चुनाव होता है। इस पेश के प्रति सम्मान के कारण ही ऐसा संभव होता है कि प्रतिभाशाली छात्र टीचिंग प्रोफ़ेशन में आते हैं।

क्या हैं फ़िनलैंड में बहस के मुद्दे

पार स्टेनबैक कहते हैं कि हमारी शैक्षिक सफलता के मात्र तीन कारण नहीं है। वे बताते हैं कि हाल ही में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि फ़िनलैंड के क्लासरूम बाकी देशों की तुलना में ज्यादा अधिकारवादी है। नवाचार और भागीदारी भले ही नए और फ़ैशनेबल हो लेकिन वे शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया (लर्निंग प्रॉसेस) के लिए हानिकारक हो सकते हैं।

फ़िनलैंड में अभी तीन मुद्दों पर काफ़ी चर्चा हो रही है। पहला मुद्दा है विज्ञान और गणित में लड़कियों का प्रदर्शन। 15 साल की उम्र में फ़िनलैंड के लड़कों की इस क्षेत्र में समझ इसी उम्र की लड़कियों से ज्यादा पाई गई। लेकिन यह अंतर बहुत ज़्यादा नहीं है और लड़कियों के लिए सकारात्मक उदाहरण पेश करते हुए इस खाई को भरने की कोशिशें जारी हैं।

वहीं दूसरा मुद्दा इतिहास के घटते हुए महत्व का है जिसके ऊपर बहस हो रही है, यहां लोगों को लगता है कि इतिहास की जानकारी का दायरा 20वीं शताब्दी से भी ज़्यादा व्यापक होना चाहिए। 

तीसरा मुद्दा भाषा के प्रशिक्षण से जुड़ा है। सवाल पूछा जा रहा है कि इसके शिक्षण पर शुरुआत से ध्यान क्यों नहीं दिया जाता?

हिंसा पर चिंता

फ़िनलैंड में स्कूलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में बढ़ती हिंसा को लेकर भी चर्चा हो रही है। इस आलेख में वे बताते हैं, “मैंने अपने एक लेख में सुझाव दिया कि कक्षा के अनुशासन को चुनौती देने वाले व्यवहार के ख़िलाफ़ कड़ाई होनी चाहिए। किसी व्यक्ति के बुरे व्यवहार के जो भी कारण हों, ऐसे व्यवहार से बाकी बच्चों के लिए भी सीखने के सकारात्मक माहौल पर असर पड़ता है। दुर्भाग्य से भविष्य से इस तरह की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो सकती है और स्कूलों में मनोचिकित्सकों की आवश्यकता होगी ताकि बिखरे हुए परिवारों से आने वाले बच्चों की मदद की जा सके।”

फ़िनलैंड की स्कूली व्यवस्था काफ़ी विकेंद्रीकृत है। नगरपालिका को राष्ट्रीय पाठ्यचर्या को अपने हिसाब से लागू करने पूरी छूट है। कौन से स्कूल में किस भाषा में पढ़ाई होगी? किस कक्षा से भाषा का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, इस बारे में फ़ैसला करने का अधिकार नगरपालिका को ही होता है। वहीं स्कूल के लिए संसाधनों का निर्धारण करने की जिम्मेदारी स्थानीय राजनीतिज्ञों के हाथ में होती है।  लेकिन शिक्षकों के पदों की संख्या और स्कूलों के मानकों में फेरबदल उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। जब कुछ नगरपालिकाओं ने शिक्षा के बजट को निश्चित करने का फ़ैसला किया तो उन्हें शिक्षक संगठनों की तरफ़ से भारी विरोध का सामना करना पड़ा।

शिक्षा और शिक्षक के पेश के लिए सम्मान

यहां के स्कूलों में भी बच्चों को भोजन दिया जाता है, विदेश से यहां आने वाले लोगों को इस योजना पर काफ़ी हैरानी होती है लेकिन फ़िनलैंड के लोगों के लिए यह आम बात है।  अपने इस लेख में पार स्टेनबैक लिखते हैं कि बच्चों के स्वास्थ्य के लिए निश्चित तौर पर यह एक अच्छी योजना है। यहां बहस बच्चों को गरम खाना देने पर नहीं है, बल्कि इस बात पर होती है कि खाने में बच्चों को क्या परोसा जाए? 

भारत के संदर्भ में शिक्षण के पेश के बारे में कहा जाता है कि यहां वेतन कम है और काम के घंटे ज्यादा है। यहां शिक्षकों को मिलने वाले सम्मान में गिरावट आ रही है। लोगों को लगता है कि शिक्षक स्कूल में काम नहीं करते। शिक्षकों के सामने बहुत सी ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका सामना करने में खुद को शिक्षक भी असहाय महसूस करते हैं। मगर उनकी बात कोई सुनने वाला नहीं है।

फिनलैंड में शिक्षा विषय पर अपने आलेख में स्टेनबैक कहते हैं कि फ़िनलैंड के सामने शिक्षा का खर्च उठाने की चुनौती है ताकि वह अपने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षाओं को पूरा कर सके। आख़िर में वे एक बड़ी मजेदार घटना बताते हैं कि एक बार उनसे एक टीवी रिपोर्टर ने स्थानीय अधिकारियों के लिए एक लाइन में कोई सुझाव देने के लिए कहा तो उनका जवाब था, “शिक्षा और शिक्षक के पेशे के लिए स्थाई सम्मान का भाव विकसित करने मं 150 साल लगते हैं।” जाहिर सी बात है कि टीवी रिपोर्टर उनके जवाब से ख़ुश नहीं हुए।

दोस्तो, ये उपरोक्त लेख agenda.weforum.org पर प्रकाशित आलेख  ‘3 reasons why Finland is first for education’ का हिन्दी अनुवाद "अध्यापक की सोच" के माध्यम से आप तक पहुंचा है। आपको ये लेख कैसा लगा ? जरूर टिप्पणी करें । इसके साथ निम्नलिखित लेख पर भी टिप्पणी करें ।


फ़िनलैंडः अब स्कूलों में ‘सब्जेक्ट’ नहीं, ‘टॉपिक’ के आधार पर होगी पढ़ाई

john--फ़िनलैंड की आबादी मात्र 55 लाख है। लेकिन इस छोटे से देश ने शिक्षा के क्षेत्र में जो कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। सालों तक फ़िनलैंड ने अपनी सफल शिक्षा व्यवस्था से दुनिया के विभिन्न देशों का ध्यान आकर्षित किया है। इसके साथ-साथ फिनलैंड नेे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले असेसमेंट में साक्षरता और गणित के क्षेत्र में भी अपना दबदबा कायम रखा है।

केवल सिंगापुर और चीन ने प्रोग्राम फ़ॉर इंटरनैशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीआईएसए) में इस देश से बेहतर प्रदर्शन किया है। विभिन्न देशों के राजनीतिज्ञ और शिक्षा विशेषज्ञ  फ़िनलैंड का दौरा इसकी सफलता का रहस्य जानने के लिए करते हैं। अभी फ़िनलैंड साल 2020 तक स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है।

यहां की शिक्षा व्यवस्था में होने वाले आमूल-चूल बदलाव पर दुनियाभर की नज़रें टिकी हैं। इसमें विषय के आधार पर होने वाली पढ़ाई (teaching by subject) की जगह टॉपिक के आधार पर पढ़ाई (teaching by topic) को वरीयता दी जाएगी। हेलसिंकी में यूथ एण्ड एडल्ट एज्यूकेशन के प्रमुख लीसा ने कहा, “यह फ़िनलैंड की शिक्षा में होने वाला एक बड़ा बदलाव होगा। हम अभी इसकी शुरुआत भर कर रहे हैं।” इस बदलाव की पहल फ़िनलैंड की राजधानी हेलसिंकी से हो रही है।

इस शहर के डेवलेपमेंट मैनेजर पैसी सिलैंडेर बताते हैं, “हमें अभी अलग तरह की शिक्षा की जरूरत है जो लोगों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी (वर्किंग लाइफ़) के लिए तैयार कर सके। आज के युवा आधुनिक कंप्यूटर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले बहुत से बैंकों में हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारी क्लर्क रखते थे, लेकिन अब चीज़ें पूरी तरह बदल गई हैं। इसलिए हम उद्योगों और आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा में जरूरी बदलाव कर रहे हैं।”

भविष्य की तैयारी

सुबह में एक घंटे इतिहास पढ़ाने, दोपहर बात एक घंटे भूगोल पढ़ाने वाली व्यवस्था में बदलाव लाया जा रहा है। इसकी जगह टॉपिक के आधार पर पढ़ाने वाली व्यवस्था लागू की जा रही है। उदाहरण के तौर पर पर प्रोफ़ेशनल कोर्स में एक किशोर को ‘कैफ़ेटेरिया सर्विसेस’ से जुड़ा पाठ पढ़ाया जा सकता है, जिसमें गणित, भाषा (ताकि विदेशी ग्राहकों को सेवा प्रदान की जा सके), लेखन कौशल और संचार कौशल के तत्व होंगे।

वहीं ज़्यादा एकेडमिक छात्रों को अंतर्विषयक टॉपिक्स पढ़ाए जाएंगे जैसे यूरोपीय संघ, जिसमें अर्थशास्त्र, इतिहास (संबंधित देश), भाषा और भूगोल के तत्व शामिल होंगे। यहां होने वाले बदलावों में बहुत सारी अन्य बातें भी शामिल हैं। इसमें निष्क्रिय ढंग से अध्यापक के सामने बैठने वाले प्रारूप में बदलाव भी शामिल है, जिसमें छात्र पाठ को सुनते हैं और सवाल पूछे जाने का इंतज़ार करते हैं। इसकी बजाय एक ज़्यादा सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाएगा जहाँ छात्र छोटे समूहों में बैठकर समस्याओं का समाधान करेंगे (problem solving skill) और साथ ही साथ अपना संचार कौशल (communication skill) भी बेहतर करेंगे।

फ़िनलैंड के शहर हेलसिंकी के एज्यूकेशन मैनेजर मार्जो केलोनेन इस महीने के आख़िर तक शिक्षा में होने वाले व्यापक बदलाव की रूपरेखा पेश करेंगी। उन्होंने कहा, “यह बदलाव केवल हेलसिंकी में नहीं बल्कि पूरे फ़िनलैंड में लागू होंगे।” हमें वाकई शिक्षा के बारे में नए सिरे से सोचने और व्यवस्था को रीडिज़ाइन करने की जरूरत है ताकि हमारे बच्चे भविष्य के कौशल सीख सकें जो आज और भविष्य के लिए जरूरी है।

‘अब वापस नहीं लौट सकते’

यहां बहुत सारे स्कूल हैं जो पुराने तरीके से पढ़ा रहे हैं जो 19वीं शताब्दी की शुरुआत से लाभदायक साबित हुआ था – लेकिन अब जरूरतें पहले जैसी नहीं है और हमको ऐसी व्यवस्था चाहिए जो 21वीं सदी के अनुकूल हो। छात्रों को ‘परीक्षा की फ़ैक्ट्री’ में धकेलने से बेहतर होगा कि हम बच्चों में संचार कौशल और अन्य क्षमताओं का विकास करें।

ऐसा नहीं है कि फ़िनलैंड में इन सुधारों का स्वागत ही हो रहा है। शिक्षकों और संस्था प्रमुखों की तरफ़ से इन बदलाओं पर आपत्ति जताई जा रही है, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी विषय विशेष पर लगा दी, अब उनसे अपना नज़रिया बदलने के लिए कहा जा रहा है। इस नई व्यवस्था को अपनाने वाले शिक्षकों के वेतन में थोड़ी बढ़ोत्तरी की जाएगी।

सिलैंडेर कहते हैं कि हेलसिंकी शहर के 70 फ़ीसदी से ज़्यादा स्कूलों के शिक्षकों को नए तरीके अपनाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “हमने वास्तव में लोगों का माइंडसेट (पूर्वाग्रह) बदलने में कामयाबी पाई है। शिक्षकों की तरफ़ से शुरुआत करवाना और पहला क़दम उठाना वाकई मुश्किल है….लेकिन जिन शिक्षकों ने नए तरीके को अपनाया है उनका कहना है कि अब वे वापस नहीं लौट सकते।”

बदलाव के नतीजे

इस बदलाव को लेकर हुए अध्ययन के शुरुआती आँकड़े दर्शाते हैं कि इस बदलाव से छात्रों को लाभ हो रहा है। इस शिक्षण पद्धति के लागू होने के दो साल बाद छात्रों का ‘आउटकम’ बेहतर हुआ है। वहां के स्कूलों में इस ‘टॉपिक आधारित शिक्षण’ को कम से एक बार लागू करने को कहा गया है। हेलसिंकी में इन सुधारों को तेज़ी के साथ लागू किया जा रहा है और स्कूलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि नए तरीके से पढ़ाने के लिए वे दो क्लॉस अवश्य लें। फ़िनलैंड के स्कूलों में इन सुधारों को 2020 तक लागू किया जाएगा। इस बीच प्री-स्कूल सेक्टर में भी इन बदलावों को नवाचारी प्रोजेक्ट के माध्यम से अपनाया जा रहा है, प्लेफुल लर्निंग सेंटर (पीएलसी) भी कंप्यूटर गेम इंडस्ट्री के साथ बातचीत कर रही है ताकि छोटे बच्चों के लिए ‘खेल’ के माध्यम से सिखाने के नये तरीके की खोज हो सके।

पीएलसी प्रोजेक्ट के निदेशक ओलावी मेंटानेन कहते हैं, “हम फ़िनलैंड को बच्चों के सीखने से संबंधित खेल का समाधान देने वाले अग्रणी देशों में शामिल करना चाहेंगे।” फ़िनलैंड जब अपनी शिक्षा व्यवस्था में  इन बदलावों को जगह दे रहा होगा तो शैक्षिक जगत की निगाहें उसके ऊपर टिकी होंगी। क्या यह अपनी पीसा (पीआईएसए) रैंकिंग को बरकरार रखने में कामयाब होगा? अगर ऐसा होता है तो शैक्षिक जगत की प्रतिक्रिया क्या होगी? यह देखने लायक होगा।

साभारः द इंडिपेंडेंट पर प्रकाशित रिपोर्ट “Finland schools: Subjects scrapped and replaced with ‘topics’ as country reforms its education system” 20/03/2015

Aks Team

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

चीन : स्कूली शिक्षा और छात्रों का जीवन

हर समाज के चहुंमुखी विकास में शिक्षा की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, यह तो आप अच्छे तरीके से जानते होंगे। किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं। क्या कभी आपने जाना है कि दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति के रुप में उभर कर सामने आने वाले चीन में शिक्षा की क्या स्थिति है। तो चलिए, आज हम चीन में स्कूली शिक्षा के बारे में कुछ जानकारी हासिल करते है, और चीनी छात्रों के जीवन के बारें में भी जानते है। सबसे पहले हम इतिहास के पन्नों को पलटते है।

सन 1949 में चीनी जन लोक गणराज्य की स्थापना से पहले चीन में सामंती व्यवस्था थी, जिसमें किसानों,मजदूरों और महिलाओं को शिक्षा से पूरी तरह दूर रखा गया था। नए चीन की स्थापना के बाद सभी लोगों को शिक्षा उपलब्ध कराने का लक्ष्य चीन ने सामने रखा। शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रयोग किए गए। यह तो आप जानते ही हैं कि हर प्रयोग हमेशा सफल नहीं होता। इसी तरह चीन में भी 1966 से 1976 की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयोग किए गए, उनका नुकसान उस समय की पीढ़ी को उठाना पड़ा। जब सब स्कूल कॉलिज और विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए और यह माना गया कि बुद्दिजीवियों को गांव में जा कर किसानों से शिक्षा हासिल कर जमीनी सच्चाईयों को जानना चाहिए। इस प्रयोग की खामियां भी तुरंत ही सामने आ गईं और इसका परिणाम यह हुआ कि देश में आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के लिए जरुरी तकनीशियनों, प्रोफेशनलों, अध्यापकों और पढ़े-लिखे लोगों का अकाल-सा पड़ गया।

लेकिन चीनी शिक्षा में सुधार जारी रहा। तंग श्याओ पिंग के नेतृत्व में चीन ने शिक्षा में उदार दृष्टि से सुधार किए और आज स्थिति यह है कि चीन में सारी जनता तक शिक्षा पहुंचाने का लक्ष्य लगभग पूरा हो गया है।

व्यापक जनता तक शिक्षा पहुंचाने के लिए चीन में कई तरह के स्कूलों की योजना बनाई गई है। यहां प्री-स्कूल, किंडरगार्टन, और ऐसे विद्यार्थियों के लिए भी स्कूल जो देख-सुन नहीं पाते है या जिनमें विशेष योग्यता है। इसके अलावा प्राथमिक स्कूल, सैकेंडरी स्कूल हैं, सैकेंडरी तकनीकी स्कूल, वोकेशनल स्कूल और सैकेंडरी प्रोफेशनल स्कूल आदि भी हैं।

चीन में विशेष स्कूल भी हैं जहां मेरिट के आधार पर छात्रों को भर्ती किया जाता है और इन स्कूलों को सरकार की ओर से अधिक सुविधाएं मिलती हैं और यहां से निकलने वाले छात्रों को अच्छे उच्च स्कूलों में प्रवेश मिलना आसान होता है। लेकिन विशेषज्ञों ने इन स्कूलों की स्थापना पर प्रश्नचिंह भी लगाए हैं और बहुत से प्रांतों ने जैसे छांगछुन,शनयान,शनचन,श्यामन आदि ने विशेष स्कूलों को खत्म कर दिया है। अंग्रेजी की शिक्षा तीसरी कक्षा से दी जाने लगती है। लगभग हर स्कूल में सप्ताह में एक दिन विद्यार्थियों को सामुदायिक कार्य भी करना होता है। विद्यार्थियों को अक्सर समूहों में बंट कर काम करना होता है ताकि वह मिल जुल कर रहना और काम करना सीख सकें। जिम्मेदारी की भावना पैदा करने के लिए स्कूल और कक्षा की आम सफाई का काम छात्रों को ही बारी-बारी से करने को दिया जाता है। 9 साल की अनिवार्य शिक्षा में शहर और गांव में दी जाने वाली शिक्षा में फर्क को कम करने के प्रयास किए गए हैं। गावों में दी जाने वाली शिक्षा में फसल के मौसम को ध्यान में रखा जाता है, छुटिटयों को, कक्षाओं को आगे-पीछे खिसकाया जा सकता है। वोकेशनल और तकनीकी शिक्षा को इसमें शामिल किया गया है।

आम तौर पर स्कूल सुबह 7 बजे शुरु हो जाता है। हर कक्षा 45 मिनट की होती है और खाने की छुटटी के अलावा शाम तक क्लासिस होती है। वैसे तो क्लास केवल पांच दिन होती हैं लेकिन बच्चों को सप्ताह की छुटटी होने पर भी छुटटी नहीं होती। परिवार में केवल एक बच्चा होने के कारण और चीन में तेजी से विकास होने के कारण नौकरी पाने, अच्छी नौकरी पाने के लिए अच्छे स्कूलों में उनके बच्चे शिक्षा पाएं, यह चिंता हर मां-बाप को, विशेषकर शहरों में रहने वाले मां-बाप को ज्यादा रहती है। माध्यमिक स्कूल पहला ऐसा एक पड़ाव है जिसमें प्रवेश पाने के लिए विद्यार्थियों को प्रवेश परीक्षा से गुजरना पड़ता है। हर शहर में कुछ स्कूल अन्य स्कूलों की अपेक्षा अधिक अच्छे माने जाते हैं और उनमें प्रवेश लेने के लिए प्रतियोगिता भी बहुत कड़ी होती है। अच्छे माध्यमिक स्कूल में उनके बच्चे प्रवेश लें, इसके लिए चूहा दौड़ लगी रहती है जिसका खामियाजा बच्चों को झेलना पड़ता है। उनका सप्ताहांत खेल, आराम की जगह निजी कक्षाएं ले लेती है।  

ऐसे ही एक बच्चे से हमने पूछा तो उसने बताया:

"शनिवार को मुझे स्कूल तो नहीं जाना पड़ता, लेकिन सुबह 2 घंटे के लिए प्यानों सीखने के लिए जरूर जाना पड़ता है, और दोपहर बाद 1 घंटे के लिए अंग्रेजी की क्लास में जाना होता है, जबकि रविवार को 3 घंटे मैथ्स की क्लास के लिए जाना होता है, और बाकी समय में स्कूल से मिला होमवर्क करना होता है।"

जब हम ने एक बच्चे के माता-पिता से पूछा कि क्या उन्हें नहीं लगता कि वे अपने बच्चे पर बहुत अधिक बोझ डाल रहे हैं तो उन्होंने कहा:

"जीवन में प्रतियोगिता बहुत कठिन है और बच्चा यदि खेल कूद में ही समय बिताता रहा तो आगे जीवन में पिछड़ जाएगा। शहरी जीवन में और तेजी से विकास कर रहे समाज के सामने ऐसी स्थितियां आती ही हैं, जिन्हें अच्छे-बुरे की कसौटी पर रख कर परखना संभव नहीं है। जब हमारा बच्चा कामयाब हो जायेगा, तो इससे बडी खुशी माता-पिता को और क्या हो सकती है"

बच्चों को अच्छे स्कूलों में डालने की चूहा-दौड़ के अलावा एक और बुखार ने शहरी चीनी समाज को अपनी चपेट में ले रखा है। वह है अंग्रेजी सीखने की दौड़। अंग्रेजी सिखाने के स्कूल शहरों में हर जगह देखने को मिल जाएंगे। अंग्रेजी सीख कर रोजगार के अवसर बढेंगे और अच्छी नौकरी मिलेगी, यह सोच कर हर व्यक्ति अंग्रेजी सीखने में लगा है। इस तरह के स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने वाले अध्यापक बहुत अच्छी तनख्वाह पा रहे हैं, जबकि उनकी तुलना में चीनी अध्यापक जो मेहनत भी ज्यादा करते हैं, उनकी तनख्वाह कम होती है। लेकिन जो बच्चे अब हाई स्कूल में और विश्वविद्यालय में पहुंचे हैं उन के सामने ऐसी समस्या नहीं है,पिछले दस साल से अंग्रेजी पर जो ध्यान दिया गया है उसका परिणाम यह है कि स्कूलों, कॉलिजों और विश्वविद्यालय में पढऩे वाले छात्रों की अंग्रेजी बहुत अच्छी है। हाँ, गांवों में स्थिति जरुर ऐसी नहीं है।

(लेखक: अखिल पाराशर)

प्रस्तुति : अध्यापक की सोच

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

जापान की शिक्षा पद्धति ही है उनकी सफलता का राज


   

छोटे-छोटे द्वीपों से मिलकर बना एक देश, जापान। 1945 में जब अमेरिका के द्वारा नुक्लेअर विस्फोट के बाद यह देश पूरी तरह तबाह हो गया था। नए अध्ययन के मुताबिक, जापान सबसे उन्नत देशों में शुमार है। इतनी जल्दी यह देश इतना विकसित कैसे हुआ यह बहुत ही दिलचस्प है। जापान की सफलता का मुख्य कारण है जापान की शिक्षा प्रणाली, उसके कुछ दिलचस्प तथ्य:

1) जापान की साक्षरता :

जापान की साक्षरता 100% है, इसका मतलब वहाँ पर सब पढाई करते हैं और सब साक्षर हैं।

2) जापानी शिक्षा प्रणाली को 4 भाग में बाँटा गया है :

6 साल की प्राथमिक शिक्षा,3 साल की जूनियर हाई स्कूल शिक्षा,3 साल की सीनियर हाई स्कूल शिक्षा,4 साल की यूनिवर्सिटी की शिक्षा 6 साल की प्राथमिक शिक्षा एवं 3 साल की जूनियर हाई स्कूल शिक्षा अनिवार्य है।

3) प्राथमिक शिक्षा में “नों होमवर्क”

छोटे बच्चों को घर पर काम करने के लिए होमवर्क नहीं मिलता। लेकिन हाई-स्कूल में आने के बाद उन्हें घर पर काम करने के लिया बहुत काम मिलता है।

4) ‘सिफुकू’ यानी स्कूल यूनिफार्म है अनिवार्य :

जूनियर हाई स्कूल तक स्टूडेंट्स को स्कूल यूनिफार्म पहननी होती है जिसे जापानी भाषा में सिफुकू (seikufu) बोलते हैं।

5) ‘क्यूशोकू’ यानी लंच सब साथ बैठ कर खाते हैं:

जूनियर हाई स्कूल तक स्टूडेंट्स को लंच अपने कक्षा में बैठ कर खाना होता है और उनके शिक्षक भी साथ में बैठ कर खाना खाते हैं। जापानी भाषा में लंच को क्यूशोकू  (kyuushokuबोलते हैं।

6) समय से और रोज़ स्कूल जाना :

जापान में छात्र कक्षा नहीं छोड़ते ना ही वे कक्षा के लिए देर से पहुँचते।

7) कोई फेल नहीं होता है :

जापान में जूनियर हाई स्कूल तक बच्चों को फेल नहीं किया जाता। उन्हें आगे की कक्षा में भेज दिया जाता है फिर चाहे उनके नंबर कितने भी काम हो। और आगे की कक्षा में ऐसे बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि वो आगे फिर से फेल न हों।

8) अच्छे शिक्षक और उनकी सैलरी :

जापान में शिक्षक बनने के लिए एक परीक्षा पास करनी होती है जिससे उन्हें शिक्षक बनने का लाइसेंस मिलता है। नव-निर्वाचित शिक्षक का मासिक वेतन 2.5 मिलियन या 2.9 मिलियन येन से शुरु होती है। ज्ञान और अनुभव के साथ-साथ यह वेतन बढ़ता जाता है और 7.8 मिलियन येन से 8.7 मिलियन येन तक पहुँच सकता है।

 

9) कोई सफाई कर्मचारी या चौकीदार नहीं होता स्कूल में :

जापान में स्कूल में विद्यार्थी अपनी कक्षा की सफाई खुद ही करते हैं और उनके इस काम में उनके शिक्षक बच्चों की सहायता भी करते हैं। वहाँ बच्चों को बचपन से ही स्वयं सफाई करना सिखाया जाता है ताकि वे सफाई रखना भी सीखें। यहाँ तक वो लोग अपने स्कूल के टॉयलेट्स भी खुद ही साफ़ करते हैं।

10) जापानी सभ्यता में अभिवादन :

स्कूल में बच्चों को बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता है। वहाँ पर सभ्यता के अनुसार उन्हें झुककर सत्कार करना सिखाते हैं। बच्चें टीचर के आते वक़्त और जाते वक़्त झुककर अभिवादन करते हैं।

11) गर्मी की छुट्टियों भी होती हैं मस्ती वाली :

40 दिन की गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद होता है लेकिन फिर भी शिक्षक रोज़ स्कूल जाते हैं और स्कूल में आर्ट, साइंस, स्पोर्ट्स, जुडो, आदि गतिविधियाँ होती हैं जिसमे बच्चे अपनी मर्ज़ी से और अपनी रूचि के अनुसार भाग लेते हैं।

12) बच्चों को गलती पर कक्षा से बहार नहीं निकलते :

बच्चों को गलती या शरारत करने पर क्लास से बहार नहीं निकला जाता है। कक्षा से बहार निकलना वहाँ की शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ है।

13) अपनी मर्ज़ी से चुनते हैं विषय :

वहाँ पर बच्चों पर मिडिल स्कूल के बाद विषय चुनने का दबाव नहीं होता है। अगर बच्चे कौन सा विषय लेना है यह निर्णय नहीं ले पाते तो शिक्षक उनकी सहयता करते हैं।

वहाँ स्कूल लाइफ बहुत अच्छी और मस्ती भरी होती है। बच्चों को बचपन से ही मेहनत करना, बड़ों का आदर करना, सफाई रखना और अपना काम करना सिखाया जाता है। इन सब कारणों से जापान का विकास जल्दी हुआ है और वह एक उन्नत देश है और स्कूल लाइफ बेस्ट लाइफ है ।

प्रेषित: अध्यापक की सोच

स्रोत: Bangaya Mudda