शुक्रवार, 18 मई 2018

बच्चों के साथ समाचार पत्र की कुछ गतिविधियां

बच्चों के बीच अखबार के साथ कुछ गतिविधियाँ

महेश झरबड़े
आज  से  कुछ  साल  पहले  जब मैंने सूखी सेवनियाँ स्थित एक स्कूल में काम करना शुरू किया तो उन दिनों पुस्तकालय में अखबार नहीं आता था। ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण समाचार पत्र जैसी सुविधा कुछ गिने-चुने परिवारों में ही थी पर बच्चों की पहुँच तो अखबार तक बिलकुल भी नहीं थी। जब पुस्तकालय में अखबार शुरू करने की बात आई, तो सोचा अखबार लें या न लें। अन्तत: ‘जो होगा देखा जाएगा’ सोचकर अखबार लेना शुरू किया। अखबार तो शुरू हो गया लेकिन पढ़ने वाले बहुत ही कम थे।
पुस्तकालय में समाचार पत्र की शुरुआत करने के हमारे उद्देश्य बहुत स्पष्ट थे :
  • बच्चे अखबार पढ़ेंगे, किताबों के अलावा एक अन्य पाठ्य सामाग्री से रूबरू होंगे।
  • अखबार से नई-नई जानकारियाँ और खबरें मिलेंगी।
  • बच्चों का भाषाई कौशल बढ़ेगा और उनका सामान्य ज्ञान भी बेहतर होगा।
जब अखबार आना शुरु हुआ तो बहुत कम बच्चे इसका उपयोग करते थे। कुछ 3-4 किशोर कभी कभार आकर अखबार के पन्ने पलटते, उसमें से खेल पृष्ठ निकालकर क्रिकेट खिलाड़ियों के बारे में बात करते। एक और समूह जिसमें 2-3 बच्चे थे, वे अखबार में देखते कि आज किस टॉकीज़ में कौन-सी फिल्म लगी है। बच्चों का एक और समूह आकर पूछता, “हीरो-हीरोइन वाला पन्ना किधर है?” यह समूह इस पन्ने में छपे चित्रों में नायक, नायिकाओं, खलनायकों की बात करता। ऐसा ही एक बहुत छोटा समूह था जो कभी कभार आकर अपना राशिफल पढ़ लेता।
कभी-कभी अखबार के पन्नों पर किसी घटना या दुर्घटना का फोटो छपा देखकर बच्चे पूछते, “यहाँ क्या हो रहा है?” इससे अखबार का एक और उपयोग समझ आता है कि किसी वास्तविक घटना के क्रियात्मक चित्रों पर बात करना। इसके अलावा अखबार का कोई विशेष उपयोग नहीं दिखाई दिया। कई दिन ऐसे भी बीते जब अखबार सारा दिन टेबल पर पड़ा रहा और किसी ने उसे छुआ तक नहीं। ऐसे में मेरे सामने कुछ प्रमुख चुनौतियाँ थीं :
  • अखबार के प्रति बच्चों की रुचि कैसे पैदा की जाए।
  • क्या करें कि अखबार सब बच्चों की जरूरत का हिस्सा बने और ज्‍यादातर बच्चे अखबार ढूँढ़कर पन्ने पलटने लगें। खबरें पढ़ने लगें।
इसलिए बच्चों की रुचियों को ध्यान में रखकर उनके साथ कुछ चर्चाएँ और कुछ छोटी-छोटी गतिविधियों की शुरुआत की गई।
शुरुआत में दस बच्चों की एक टीम  का  गठन  किया  गया  जो ‘पुस्तकालय टीम’ के नाम से जानी गई। इस टीम को, बच्चों को किताबें बाँटने और जमा करने की ज़िम्मेदारी दी गई, साथ ही उनके साथ यह भी तय हुआ कि माह में एक बार हम मीटिंग करेंगे और पुस्तकालय को बेहतर करने के लिए चर्चा करते रहेंगे (इस टीम में चौथी से लेकर नौवीं तक के बच्चे शामिल थे)। मैंने उन्हें रोज़ सुबह अखबार पढ़कर सुनाना और उनके साथ खबरों पर बातचीत करना शुरू किया। कुछ बच्चे सुनते और कुछ पुस्तकालय की किताबों में लग जाते और ध्यान नहीं देते। मैं भी इसे नियमित नहीं कर पाया लेकिन सप्ताह में दो बार पढ़ने का काम तो हुआ ही। लगभग आधा साल समाचार पत्र पढ़ते-सुनते ऐसी स्थिति जरूर बन गई थी कि बच्चे आकर अखबार पलटकर देखने लगे थे, पर वे पेपर फैलाकर कहीं भी छोड़कर चले जाते। इस समस्या के समाधान के लिए एक संक्षिप्त चर्चा के साथ एक गतिविधि की शुरुआत हुई।
पन्नों को क्रम से जमाना
जब ‘पुस्तकालय टीम’ के बच्चे इकट्ठा हुए तो सबको बिठाकर बातचीत की शुरुआत हुई। “कौन-कौन जानता है कि अखबार में कितने पृष्ठ होते हैं?” गायत्री बोली, “मुझे मालूम है, 15 पन्ने होते हैं।” मनीषा ने कहा, “नहीं 18 होंगे।” रीना, संगीता ने भी अन्दाजा लगाकर कहा, “18-20 होंगे।” इसके पहले कभी किसी ने पन्ने नहीं गिने थे, शायद सोचा भी नहीं था। मैंने कहा, “चलो, अखबार निकालो और गिन लो।”
बच्चों ने दो-तीन दिन के अखबार निकाले और गिनने में मशगूल हो गए और चन्द मिनिट बाद पुन: गोले में हाजिर हो गए।
“सबको पता चल गया कितने पन्ने होते हैं?”
गायत्री बोली, “किसी को सही नहीं पता था। छोटे-बड़े मिलाकर 16 पन्ने होते हैं।”
मैंने बताया, “जब पन्नों को आगे-पीछे गिना जाता है तो उन्हें पृष्ठ कहते हैं।”
गायत्री बोली, “फिर तो 32 पृष्ठ हैं।”
मनीषा बोली, “मेरे पेपर में तो 30 ही पृष्ठ हैं।”
सीमा ने कहा, “मेरे पास भी 32 पृष्ठ हैं।”
समस्या के समाधान के लिए मैंने सलाह दी, “यह देखो कि किस दिन का पेपर है।”
“मेरे पास सोमवार का है,” गायत्री ने बताया।
“हमारे पास बुधवार का है,” मनीषा ने बताया।
“हम पे गुरूवार का है,” विजय बोला।
गगन बोला, “मतलब हर दिन पन्नों की संख्या अलग-अलग होती है।”
“मुझे भी लगता है,” संगीता ने दोहराया।
तभी सतीश बोला, “ऐसा नहीं है, सोमवार और गुरूवार के पन्ने तो बराबर हैं।” हमने बातचीत में तय किया कि अब हम हर दिन पेपर जमाकर और पन्ने गिनकर नोट कर लेंगे ताकि सबको पक्का पता चल जाए कि किस दिन कितने पन्ने आते हैं।
रमन ने सुझाव दिया, “भैया, हमको पुस्तकालय में भी पन्नों की जानकारी लगाना चाहिए।” सबकी सहमति के आधार पर एक चार्ट तैयार किया गया। इस चार्ट में एक माह तक रोज पन्ने गिनकर भरने की जिम्मेदारी बच्चों ने अपने आप ले ली। अब बच्चे रोज अखबार के पन्नों को गिनकर और जमाकर रखने लगे थे।
एक दिन कक्षा तीसरी की वंदना अखबार के पन्ने जमा रही थी। मैंने पूछा, “तुम्हें कैसे पता चलता है कि यही पन्ना पहला है, अमुक दूसरा और फलाँ पन्ना तीसरा?”
वह बोली, “पेपर के सब पन्नों पर गिनती लिखी रहती है। देख-देख कर जमा देती हूँ।” बच्चों को खुद से काम करने दिया जाए तो वे सीखने की बारीकियाँ खुद-ब-खुद ढूँढ़ लेते हैं।
इससे मुझे एक और गतिविधि मिल गई थी। जब पुस्तकालय में छोटे बच्चे होते तो मैं कई बार बच्चों को अलग-अलग दिन का अखबार फैलाकर देता और उनसे कहता कि गिनती देखकर जमाओ या फिर पेज नम्बर 3 निकालो और उसे देखकर बताओ कि तुम्हारा पन्ना उसके पन्ने से कैसे अलग है। कभी-कभी मैंने अखबार में जहाँ-जहाँ पर में, हैं, था, और आदि शब्द लिखे हैं उन्हें ढूँढ़कर गोला लगवाने जैसा बोझिल काम भी करवाया और देखा कि जिसे मैं बोझिल समझता था, छोटे बच्चों के लिए वो बहुत मजेदार साबित हुआ। बच्चे मजे से घण्टे भर तक ये काम करते रहे। सलोनी जो कक्षा-1 में पढ़ती थी, मैंने उससे और शब्द पर गोला लगवाया था। उसने घर जाकर अपनी किताब के सभी पन्नों से और ढूँढ़कर न सिर्फ उन पर गोला लगाया बल्कि वह इस शब्द को पढ़ने भी लगी थी, मात्र एक दिन में।
इधर अखबार के पन्ने गिनकर लिखने का काम तो चल ही रहा था। एक दिन विजय ने आकर बताया, “अब मैं बिना पन्ने गिने बता सकता हूँ कि कौन से दिन अखबार में कितने पन्ने होंगे।” मैंने पूछा, “कैसे...?” वह एक अखबार उठाकर लाया और बोला, “पढ़ो, क्या लिखा है।” उसमें लिखा था - कुल पृष्ठ 20+12=32।
उसने कहा, “मैंने गिनकर देखा है जितना लिखा है, अन्दर उतने ही पन्ने होते हैं।”
वह खुश होते हुए मुझसे बोला, “सर जी, पढ़ने का क्या फायदा है आज मैंने भी देख लिया।”
लगातार पेपर क्रम में जमाते-गिनते एक तरफ बच्चों को कुछ हद तक अखबार के पृष्ठ भी समझ आने लगे थे। एक दिन संगीता बोली, “भैया, अखबार के हर पन्ने पर, ऊपर लालपट्टी में भोपाल, देश-विदेश, राज-काज, स्पोर्ट्स, अभिव्यक्ति लिखा रहता है और उसमें वैसी ही खबरें भी होती हैं, है ना?” वह सही कह रही थी लेकिन इतनी बारीकी से वह कब अखबार देखने लगी थी मैं नहीं जान पाया। अखबार बच्चों के करीब तो पहुँचा पर अभी भी मिशन अधूरा था इसलिए एक नई गतिविधि पर चर्चा हुई।
किस फोटो का नाम पता है?
इस बार जब हम पुस्तकालय टीम के साथ बैठे तो मेरा सवाल था, “आज के पेपर में कितनी तस्वीरें या फोटो होंगी?” अटपटा-सा सवाल था, भला फोटो कौन गिनता है?                                              
“नहीं मालूम।”
“तो गिन लो।”
बच्चों ने गिनकर बताया कि 103 फोटो हैं। प्रकृति और जानवरों को हटाकर 83 फोटो बचीं जिनमें अभिनेता, राजनेता, मंत्री, और कुछ स्थानीय लोग थे। मैंने पूछा, “इनमें से कितनों के नाम पता हैं?” प्रदेश के मुख्यमंत्री, नायक-नायिकाओं और क्रिकेट खिलाड़ियों के अलावा बच्चे किसी और को नहीं जानते थे। उस दिन शिक्षामंत्री का फोटो भी छपा था। मैंने पूछा, “शिक्षामंत्री का नाम पता है?”
“हाँ,” गायत्री बोली।
“कभी देखा है उनको?”
“नहीं,” बच्चों ने बताया।
फोटो दिखाकर मैंने कहा, “ये रहीं हमारी शिक्षामंत्री।”
“अरे! ये शिक्षामंत्री हैं? इनको फोटो में बहुत बार देखा है, नाम भी पता है लेकिन ये नहीं पता था कि शिक्षामंत्री यही हैं,” सतीश ने कहा। उस दिन की चर्चा में बच्चों ने ऐसे बहुत-से नाम गिनवाए जिन्हें स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने रटा तो था पर अगर वो नाम वाला इन्सान सामने आ जाए तो उसे पहचान नहीं पाते।
उस दिन हमने तय किया कि अब से पेपर में अंकित तस्वीर किसकी है, हम यह भी पता करेंगे। उन्हें यह भी बताया कि अक्सर चित्र के ऊपर-नीचे या दाएँ-बाएँ ही उसका नाम भी लिखा होता है। अगले दिन से फोटो का नाम ढूँढ़ने की कवायद भी शुरू हो गई। अब बच्चे पन्ने गिनते और उन्हें क्रम में जमाते हुए अखबार में छपे चित्रों में कौन है, यह जानने की कोशिश में चित्र के आसपास लिखी लाइनों को पढ़ने की कोशिश भी करते और उन पर आपस में बातें करते। जो बच्चे पढ़ नहीं पाते थे वे चित्र देखकर एक-दूसरे से पूछते। नाम ढूँढ़ने की इस कवायद से पढ़ने की एक छोटी-सी शुरुआत हुई।
आज की कोई खबर सुनाओ
एक दिन लंच टाइम पर बच्चों से चर्चा हुई, “पेपर से हमको कौन-कौन-सी जानकारियाँ मिलती हैं?” बच्चों ने बताया :
  • पता चलता है कहाँ क्या हो रहा है,
  • किसने किसको मारा,
  • कौन-सी नई फिल्म लगी है,
  • क्रिकेट मैच कहाँ पर है, कौन हारा-कौन जीता,
  • टी.वी.-कूलर की कीमत कितनी है,
  • मोबाइल का नया सेट कौन-सा है,
  • कहाँ का नेता कौन है,
  • भूकम्प, बाढ़, लड़ाई, झगड़े की जानकारी मिलती है।
इस सबसे समझ आ रहा था कि पेपर का उपयोग होने लगा है और बच्चे कुछ हद तक पेपर पढ़ने लगे हैं।
खबर या समाचार क्या है, इस पर चर्चा हुई और अखबार से ढूँढ़कर एक-एक खबर सुनाने का काम दिया गया। बच्चों ने खबर के रूप में पूरा पैराग्राफ सुनाया। इसे छोटा करते हुए खबर बनाने तक बातचीत हुई। पैराग्राफ से खबर निकालना थोड़ा मुश्किल काम था। अत: अखबार से एक खबर का उदाहरण लेकर इन बिन्दुओं पर चर्चा हुई।
  • किस जगह की बात है?
  • कब की बात है?
  • मामला क्या था?
  • घटना का क्या असर हुआ?
इन बिन्‍दुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी बात कहने की सलाह दी गई। अबकी बार पेपर पढ़ने के बाद जब टीम ने अपनी बात कही तो उसमें खबर का हल्का-सा स्वरूप नजर आया। लगभग दो माह के प्रयासों के बाद बड़े बच्चों, खासकर 8वीं और 9वीं के बच्चों ने खबर बनाकर सुनाना शुरू कर दिया।
सभा में समाचार
पुस्तकालय में खबरें सुनाने का दौर शुरू हो गया था। लेकिन इन खबरों का लाभ सिर्फ उन्हीं बच्चों को मिल रहा था जो पुस्तकालय में आते थे। इसीलिए लगा कि इस बात को फैलाना चाहिए। परन्तु कैसे यह बात ज्‍यादा-से-ज्‍यादा बच्चों तक पहुँचे और सब बच्चों की भागीदारी इसमें हो पाए, इसकी चर्चा बच्चों से की गई। संगीता, मोना, गायत्री की तरफ से सुझाव आया, “स्कूल में प्रार्थना के बाद बच्चों को सुविचार बोलना होता है। बहुत-से बच्चे और हम भी प्रार्थना के बाद सुविचार बोलते हैं। यदि वहीं पर समाचार बोलने का काम भी शुरू हो जाए तो ज्‍यादा बच्चे सुन पाएँगे। लेकिन अभी तो कोई भी समाचार नहीं बोलता है इसलिए सिर्फ हम बोलेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा और हो सकता है कि हमारा मजाक उड़ाया जाए।” सुझाव बहुत अच्छा था और सबको पसन्द भी आया लेकिन थोड़ी समस्या थी। समाधान के लिए मैंने बच्चों से पूछा, “तो फिर क्या करें?” उपाय भी उन्होंने ही सुझाया। सतीश ने कहा, “अगर प्रिंसिपल सर कह देंगे तो बात बन जाएगी। फिर सब बच्चे बोलने लगेंगे, अन्य बच्चे नहीं बोलेंगे तो हम तो बोलेंगे ही।”
समाधान आसान था इसलिए मैंने कहा, “आज लंच टाइम पर सब प्राचार्य के ऑफिस के सामने मिलो।” मैंने बच्चों को साथ लेकर समाचार वाली बात प्रिंसिपल सर को बताई। यह सुनकर वे बहुत खुश हुए और बच्चों को शाबाशी देते हुए उन्होंने कहा, “कल से प्रार्थना में इसकी शुरुआत करो। सभी शिक्षकों और बच्चों को इसकी खबर दे देते हैं।” मैंने भी प्राचार्य की सहमति के आधार पर बच्चों की तरफ से एक चिट्ठी सभी कक्षा-शिक्षकों को भेज दी। लाइब्रेरी टीम सबसे ज्‍यादा खुश हुई क्योंकि उनकी आवाज सभी कक्षाओं तक पहुँची थी।
इस तरह पुस्तकालय की एक छोटी शुरुआत को बच्चों की कोशिश और शाला परिवार के सहयोग ने न सिर्फ एक बड़ा मंच प्रदान किया बल्कि इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रयास भी किया और इस नई शुरुआत को बाद में भी खत्म नहीं होने दिया (स्कूल की प्रार्थना में आज भी समाचार पढ़े जाते हैं)।
समाचार से मानचित्र तक
समाचार सुनाते वक्त जिस स्थान की बात हो रही होती उसका नाम तो बताया जाता लेकिन मानचित्र में वो जगह कहाँ पर है, उसके पड़ोस में कौन-सा राज्य-शहर है, यह जानना भी ज़रूरी लगा। अत: बच्चों से पूछा, “पेपर में से जो खबरें तुम सुनाते हो, क्या उस खबर से जुड़े राज्य या शहर को तुम नक्शे में ढूँढ़ सकते हो?”
“हाँ भैया, कोशिश करेंगे।” इस सहमति के बाद से हमने खबरों की जगह को नक्शे में ढूँढ़ना भी शुरू किया। एक दिन एक बच्चे ने पूछा, “ये वही गुजरात है न, जहाँ के महात्मा गाँधी हैं?” और एक साथ 4-5 बच्चे मानचित्र में गुजरात देखने दौड़ पड़े। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था! फिर मैंने उनसे पूछा, “नक्शे में झारखण्ड ढूँढ़ सकते हो?” बच्चों ने झारखण्ड ढूँढ़ा तो मैंने कहा, “यहाँ के हैं आपके महेन्द्र सिंह धोनी।”
“अच्छा तो वो इधर के हैं।”
मेरा अनुमान सही था  जिन व्यक्तियों के नाम वे जानते थे उनसे जुड़े राज्य-शहर को वे ढूँढ़ना चाहते थे और उस जगह को नक्शे में देखकर वे खुशी महसूस कर रहे थे। इसलिए लगा कि उन सब नामों की सूची बनाई जाए जिनकी शक्ल-सूरत यानी फोटो से हम परिचित हैं और फिर उनसे जुड़े राज्य और शहर को नक्शे में ढूँढ़ा जाए।
काम अच्छा था लेकिन बच्चों की रुचि अभी भी वैसी नहीं बन पा रही थी जैसी मैं तलाश रहा था। इसकी वजह भी थी। नक्शे के सामने उन्हें ज्‍यादा देर तक खड़ा रहना पड़ता था जो मुश्किल था। मैं कोई ऐसी चीज तलाश रहा था जिससे उन्हें खड़े रहने से निजात मिल पाए। तभी मुझे पता चला कि एकलव्य के पिटारा में ‘भारत जोड़ो’ और ‘मध्यप्रदेश जोड़ो’ नाम से पजल मिलते हैं। मैंने 3-3 सेट खरीदे और अपनी लायब्रेरी पहुँचा। बच्चों को ये सामग्री बहुत पसन्द आई। अब हमारे पास समाचार पत्र को पास में रखकर, राज्यों के नामों को छूकर, उठाकर देखने के भरपूर मौके थे। प्रदेश के अन्दर जिलों और शहरों के नामों को बैठकर ढूँढ़ा जा सकता था और सबसे मजेदार बात थी, पजल जमाकर पूरे भारत का नक्शा तैयार करना। पजल जमाते-जमाते बहुत-से बच्चों को राज्यों और शहरों के नाम और राज्य की राजधानी के नाम याद हो गए थे। अब दिल्ली की खबर सुनाने के साथ-साथ, नक्शे में दिल्ली कहाँ है वे यह भी जानने लगे थे।
निश्चित तौर पर इस वजह से अखबार पढ़ने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी भी हुई। अब अखबार की कोई खबर पढ़ी जाती तो दस में से दो बच्चों की नज़रें जरूर नक्शे की ओर मुड़ जाती थीं, यह जानने के लिए कि यह बात कहाँ की है और नक्शे में यह जगह किधर होगी।
तस्वीर काटोफाइल बनाओ
जो तस्वीरें रोज के अखबार में आती थीं उन्हें नाम सहित लम्बे समय तक याद रखने का सबसे अच्छा तरीका था उन्हें काटकर किसी कार्डशीट पर चस्पा करना, उस शीट को कुछ दिन तक पुस्तकालय में लगाए रखना और फिर बाद में उसकी फाइल बनाकर पुस्तकालय में सुरक्षित रखना। जब हमारे पास चित्रों की संख्या ज्‍यादा हो गई तो हमने अलग-अलग कार्डशीट पर एक ही तरह के लोगों की फोटो लगाने की योजना बनाई जैसे एक कार्डशीट पर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की फोटो, एक पर सभी जिलाधीशों की फोटो आदि।
पुस्तकालय में उपस्थित बच्चों को 4-4 के समूहों में बाँटा गया और उन्हें अलग-अलग दिनों के अखबार देकर पूछा, “अखबार में किस-किस क्षेत्र से जुड़ी खबरें हैं? ढूँढ़कर लिखो।” बच्चों ने आपस में बातचीत करते हुए सूची बनाई :
  • पढ़ाई-लिखाई की खबरें, स्कूल की खबरें
  • अस्पताल, डॉक्टर, मरीजों की खबरें
  • पुलिस, चोरी, लूट, मार की खबरें
  • खेती-बाड़ी की खबरें
  • फिल्मों की खबरें
  • खेल, क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, मैच हार-जीत की खबरें
खबरें किस-किस क्षेत्र की होती हैं, यह समझने के बाद बच्चों को समूहों में बाँटकर जिम्मेदारी दी गई कि हर सप्ताह अपने चयनित विषयों जैसे स्कूल, बीमारी, सरकारी योजनाओं की खबरें एकत्रित करें और किसी एक दिन सबको सुनाएँ।
इस गतिविधि ने बच्चों को अलग-अलग क्षेत्रों की खबरें ढूँढ़ने और उन्हें पढ़कर अन्य बच्चों तक पहुँचाने के लिए प्रेरित किया।
इस तरह अखबार का उपयोग अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से करते हुए बच्चों को अखबार से जोड़ने का प्रयास किया गया। और फिर ऐसी स्थिति भी आई जब बच्चे सबसे पहले आकर अखबार ढूँढ़ने   लगे। पुस्तकालय में अखबार की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है और  इसका उपयोग पाठक को नए शब्दों, नए विचारों और ढेर सारी जानकारियों से ओत-प्रोत कर सकता है लेकिन जब तक पाठक की रुचि इसमें शामिल नहीं हो जाती, इसकी कीमत मात्र अखबार की कीमत तक ही सीमित रहेगी।

महेश झरबड़े : भोपाल स्थित मुस्कान संस्था में काम करते हैं। मुस्कान बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों जैसे स्वास्थ्य, रोजगार आदि पर काम करती है।
सभी चित्र : अंकिता ठाकुर : राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान, अहमदाबाद से ग्राफिक डिजाइन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। बाल साहित्य और चित्रों में दिलचस्पी रखती हैं।
(शैक्षणिक संदर्भ अंक 111 से साभार )

प्रेषित: अध्यापक की सोच

सोमवार, 14 मई 2018

Changes Around Us

Basic Information


Changes occur everywhere, and every moment around us. Everything in the world is subject to change. But why and how do things change? Do they all follow the same pattern? Or do different things change differently? What are the different kinds of changes? These are the questions that this lesson seeks to answer.

Lesson plan Details

Duration: 
03 hours 00 mins
Introduction: 
Change  is the only constant in this world and nothing else is.  In our everyday life we observe so many changes around us—of night turning into day, of our piping hot breakfast turning cold before we consume it,  of fresh flowers in the morning drooping by evening. While these are more immediate changes, there are also changes that take place over a period of time. So how does one teach such a ubiquitous topic? This article tells you how the inductive teaching method can be used to teach about the changes around us. This approach can, in fact, trigger multi-dimensional learning in children. 
Objective: 
  • To understand terms like slow change, fast change, reversible change, irreversible change, periodic change, desirable change and undesirable change.
  • To distinguish one kind of change from another.
  • To be able to give examples of the various changes discussed.
Steps: 
Changes around us
Changes around us is a topic that has a lot of scope to be taught in an interesting manner, especially because change is all around us and children can see different changes occurring. Although they may not yet be able to apply scientific principles to ‘change’, children do know what change is. So why not begin with what they know.
Step 1:
You can start the discussion on this topic by asking children about the changes they have seen.
Have they seen a bud becoming a flower, or night becoming day?
The Inductive Thinking Model has three strategies— concept formation, interpretation of data and application of principles.
Accordingly, begin by building on what the students already know: the various changes occurring around them in their daily lives.
Note for the teacher: Show the children pictures of young and old people and ask them to comment. Display some ice cubes and ask the children to observe. Get a student to stretch a rubber band and ask students to see what happens.
Once the children have made their observations, you can introduce the topic– Changes around us.
Step 2:
Take the topic further by asking students to list five or six changes they have seen around them. Add some more changes not mentioned by the students.
A list of changes  
  • Child becomes man
  • Plant becomes tree
  • Seed becomes plant
  • Burning of paper
  • Shoes become old 
  • Uniforms become old
  • Pencils become short
  • Boiling of water
  • Night becomes day
  • Hot becomes cold
  • Rusting of iron
  • Ripening of mangoes
  • Earthquakes
  • Accidents
  • Summer season
  • Fading of wall paint
  • Milk becoming curd
  • Stretching of a rubber band
  • Melting of ice
Now get the children to group these ideas under various headings. Rather than giving them the heads, let them decide the criteria for grouping.
Here is an example of the different groups that can be formed for the above list of changes.
Group ASmall to big
Group BBecoming bad
Group CBecoming old
Group DChange in time
Group EChange in temperature
Group FBecoming good
Group GHappens suddenly


Once the children have grouped their list of changes, ask questions like which changes take more times? Which less? These will be the slow and fast changes. Which changes give us new things? For example, when raw mango becomes ripe, is it possible for us to get back the raw mango? Tell children that such a change is called ‘irreversible change’. In this way, slowly introduce scientific names of the various changes to the children.
Earlier, the children had observed the melting of the ice cubes. Ask them what will happen if you put that same water back in to the freezer. Ice cubes form again. These are therefore, reversible changes.
Step 3:
Now you can show the children pictures of 

  • A young lady and an old lady
  • A seed and a plant
  • A raw mango and a ripe one
  • A burnt piece of paper and a fresh one
  • A child and a man

Ask the children to write down the type of changes these are. Based on what they have learnt so far, the children will be able to identify the type of change. For the changes that they don’t still identify, you can follow the same method of eliciting the answers from them asking probing questions.
Make a chart with a list of changes and write down the different types of changes there are. Against each item, tick the type of change it is. And together with the children fill up the chart. There are desirable and undesirable changes as well, which you can add to the list. Like milk becoming curd and nails rusting respectively.  Changes that happen again and again after a fixed time are called periodic changes, like morning turning into evening or every Monday followed by a Tuesday.  Do accidents happen after a fixed time? Do earthquakes and volcanoes occur every few months? Such changes you can point out to the children are non-periodic changes. Add these to the list of types of changes on the chart. (For an example of a chart with the changes and the different types see resources 1 and 2 - Tables 1 and 2).
This lesson first appeared in Teacher Plus, Volume 3, Issue No.2, March-April 2005 and has been adapted here with changes. 

Support Material: 

Posted by: Aks group of Series

मंगलवार, 8 मई 2018

शिक्षा में बदलाव की चाह

चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों, इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है!

20151212_154908आमतौर पर विद्यालय की दिनचर्या शिक्षकों के मुताबिक़ एक ख़ास गति से आगे बढ़ती है। बहुत सारी चीज़ों के निर्धारण की जिम्मेदारी शिक्षक की होती है, इसलिए वे ही एक धुरी के रूप में नज़र आते हैं। हर किसी के काम करने का तरीका अलग-अलग होता है। इसलिए कोई नेतृत्व करने के लिए सामने आ जाता है और बहुत सारी जिम्मेदारियों को सहजता से स्वीकार कर लेता है। बाकी लोग नेपथ्य से नेतृत्व करने या फिर नेपथ्य से नेतृतव की टाँग खींचने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं, यह शिक्षा व्यवस्था की एक सच्चाई है कि यहाँ पर बदलाव विरोधी मानसिकता एक स्थायी भाव की तरह सतत मौजूद होता है।
इस स्थायी भाव में बदलाव की हर कोशिश का शिक्षा तंत्र में भरपूर विरोध होता है। चाहें यह बदलाव भाषा के पढ़ाने के तरीके के लेकर हो, विद्यालय के समय में परिवर्तन को लेकर हो, या फिर विद्यालय के कैदखाने में बंद किताबों को बच्चों को नियमित रूप से बाँटने की बात हो, ले-देकर मुद्दा यही होता है कि अगर स्थायी भाव वाली दशकों से चली आ रही व्यवस्था में बदलाव होना ही है तो फिर इसे करेगा कौन? शायद इसीलिए विद्यालय स्तर पर अधिकारियों और संस्था प्रमुखों द्वारा प्रभार देने का चलन शुरू हुआ होगा।

प्रभार का ‘भार’, जो उठाता है वही जानता है

children-of-village-playing-in-communityउदाहरण के तौर पर अगर किसी राज्य के किसी नये अगर जिले में लिट्रेसी का कार्यक्रम शुरू होना है तो आमतौर पर शुरूआती बातचीत में प्रधानाध्यापक कहते हैं कि सर इसका प्रभार तो फलां शिक्षक को दे दीजिए। हमने अपनी तरफ से हर प्रशिक्षण के लिए उनको नियुक्त कर रखा है। वे हमारे विद्यालय के प्रशिक्षण व कार्यक्रम प्रभारी हैं। ऐसे संवाद में हमें कई बार कहना पड़ता था कि सर हम आपकी विनम्रता के आभारी हैं, मगर इस कार्यक्रम में सिर्फ़ प्रभार ही नहीं लेना है। बल्कि रोज़ाना काम करना है।
ऐसी परिस्थिति में काम करने वाले शिक्षक को आगे करने और अपने ख़ास मगर प्रतिभाशाली शिक्षक को बचा लेने वाली कहानियों का भी चश्मदीद गवाह बनने का अवसर बहुत सी स्कूल विज़िट में मिला है। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान किसका होता है? इस सवाल का एक ही जवाब है बच्चों का। इस सवाल का जवाब जानने के बावजूद कि बच्चों का नुकसान हो रहा है, सिर्फ समस्याओं के शोर में संवाद को रोकने की हर संभव कोशिश होती है।

सिर्फ पुरस्कार पाने वाले तिकड़म, प्रयास से फर्क होते हैं

a-letter-to-my-teacherहाँ, अगर किसी पुरस्कार के लिए विद्यालयों का चुनाव होने वाला है तो ऐसे प्रधानाध्यापक काफी भागादौड़ी करते हैं और शिक्षकों को सारा दिन बैठाकर रजिस्टर दुरूस्त करने और विद्यालय आने वालों से फर्जी फीडबैक जुटाने की तरफ पूरा ध्यान देते हैं।
ताकि विद्यालय में घुसते ही अधिकारियों का दिल जीता जा सके। उनको बाहरी चकाचौंध से प्रभावित किया जा सके। क्योंकि शैक्षिक स्तर जानने के लिए तो बच्चों के साथ समय बिताना पड़ता है और कक्षा-कक्ष में शिक्षण की प्रक्रिया का आकस्मिक व सहज भाव से अवलोकन करना होता है।
इतना समय वास्तव में प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों के पास नहीं है क्योंकि वे विभागीय कामों में व्यस्त होते हैं। चाहते तो वे भी हैं कि चीज़ें बदलें, मगर व्यस्तता और प्राथमिकताओं के विरोधाभाषा में वे भी अपना संतुलन साधने का प्रयास करते हैं। अगर पुरस्कार वाली कहानी के अगर विस्तार में चलें तो उपरोक्त परिस्थिति वाले स्कूलों का शैक्षिक स्तर वास्तव में बाकी स्कूलों के बराबर नहीं होता है। पर बहुत से प्रधानाध्यापक सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए अपने विद्यालय के शौचालय के दरवाज़े का ताला विज़िट करने के लिए आई टीम के लिए खोल देते हैं, जो सिर्फ उनकी जरूरत पर खुद उनके लिए ही खुलता है। ऐसी स्थिति के बाद भी उस विद्यालय को अनुशासन, स्वच्छता, मिलनसार होने और वफादारी होने के नाम पर विद्यालय को पुरस्कार मिल जाता है।

‘नकली पुरस्कारों’ से काम करने वाले हतोत्साहित होते हैं

education-system-in-indiaइसके विपरीत उस स्कूल के शिक्षकों को कठिन सवालों का सामना करना पड़ता है जो वास्तव में अच्छा काम कर रहे होते हैं, मगर तमाम तरह के प्रचार-प्रसार और निरंतर संपर्क में बने रहने के लिए बच्चों का समय खराब करने की बजाय उस समय को बच्चों के शिक्षण हेतु इस्तेमाल करते हैं।
इससे प्रोत्साहित होने वाले को सच पता रहता है और हतोत्साहित होने वाले को हैरानी होती है, या वे भी सहज भाव से मान लेते हैं कि पुरस्कार और जुगाड़ का चोली-दामन का साथ है, अच्छा है कि हम अपने काम में ही व्यस्त रहें। इसलिए वे टाइम ऑन टास्क यानि कक्षा-कक्ष में शिक्षण के वास्तविक समय को बच्चों की जरूरत के अनुसार ऊंचा रखते हैं और दावे के साथ अपने बच्चों को किसी भी टीम के सामने किताब पढ़ने और संवाद करने का अवसर देते हैं।

प्रधानाध्यापक की ‘लीडरशिप’ से यथास्थिति में बदलाव

education-mirror-imageअगर संस्था प्रमुख में नेतृत्व करने और काम का सही बँटवारा करने की कला हो तो संस्था की कहानी केस स्टडी लायक बन जाती है। संसाधनों का अभाव, अधिगम स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव को नकारात्मक नहीं बना पाता। एक सजग संस्था प्रमुख अपने शिक्षकों को वह रचनात्मक तरीके से स्वायत्तता और व्यवस्था के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनसे निरंतर बच्चों के सीखने में होने वाली प्रगति के बारे में बात करता है।
ऐसे प्रधानाध्यापक स्टाफ बैठक के दौरान अभिभावकों के सवालों और व्यवस्था के बढ़ते दबाव की वास्तविकता से अवगत कराते हैं। कई बार सीधे-सीधे कहता है कि देखिए सर, अगर स्कूल में बच्चे हैं तो हम हैं। हम स्कूल में बच्चों के लिए हैं और बच्चे स्कूल में बहुत सी बुनियादी बातें सीखने और जीवन कौशलों का विकास करने के उद्देश्य से आते हैं। ताकि वे समाज के बेहतर नागरिक बन सकें। ऐसा नागरिक जो रचनात्मक योगदान देता हो, ऐसा नागरिक नहीं कि कल को हमारी और आपकी बदनामी हो कि अरे, यह लड़का तो फलां स्कूल से पढ़ा हुआ है।

‘सही लीडरशिप’ में निखरते हैं शिक्षक

उपरोक्त शीर्षक में ‘सही लीडरशिप’ का आशय ऐसे नेतृत्व से है जो लोगों को सबल बनाता है। मजबूत बनाता है। अपने स्कूल को एक टीम की तरह देखता है और शिक्षकों को अपनी क्षमता व रुचि के अनुसार विषय चुनने की आज़ादी के साथ-साथ काम करने की आज़ादी देता है। अगर कोई काम नया है, तो उसे सीखने में सहयोग का भाव रखता है। ऐसे गुणों से संपन्न प्रधानाध्यापक साथी शिक्षकों का सम्मान पाते हैं।
education mirror, primary education in indiaऐसे माहौल में शिक्षक अपनी भावी जिम्मेदारी को एक प्रधानाध्यापक में देख पाते हैं, अपने काम की गंभीरता और जिम्मेदारी को स्वीकार करना सीखते हैं। ऐसे कई प्रधानाध्यापकों से मिलना हुआ है जिन्होंने अपने शिक्षक वाले कार्यकाल के दौरान अपने प्रधानाध्यापकों से बहुत कुछ सीखा था। वे उनका जिक्र करते हुए कहते कि हमारे काम की सक्रियता और सटीकता में उस सार्थक नेतृत्व की बड़ी भूमिका है, जहाँ हमें जिम्मेदारी और सहयोग दोनों मिला।
ऐसे सजग संस्था प्रधान की लीडरशिप में यहाँ के रोज़ाना की प्लानिंग और ख़ास रणनीति के अनुसार पढ़ाने से डरने वाले शिक्षक भी 6 महीने या सालभर की तैयारी के बाद अपनी शिक्षण प्रक्रिया और बच्चों की जरूरत के बीच तालमेल बैठाना सीख लेते हैं। वे धीरे-धीरे ऐसा माहौल बनाने की जरूरत को भाँप लेते हैं, जो बच्चों को आपस में एक-दूसरे से सीखने का अवसर देने वाली हो। उनको पता होता है कि कमज़ोर बच्चों को आगे बढ़ने में मदद करने का भाव अगर कक्षा के सारे बच्चों में आ गया तो फिर कोई पीछे नहीं रहेगा। पीछे रहने वाले बच्चे भी आगे आने के लिए प्रयास करना शुरू कर देंगे।

एक ‘चिंतनशील शिक्षक’ बदलाव की प्रक्रिया से गुजरता है

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अपने काम की प्रक्रिया में ऐसे शिक्षक सच्चे खुले मन से अपनी कमज़ोरियों और सुधार के क्षेत्रों को पहचान पाते हैं। इस यात्रा पर चलने वाले शिक्षक की ख़ास बात होती है कि वे अपनी ताक़त को ‘बड़ी ताक़त’ में तब्दील कर लेते हैं। कमज़ोरियों की जगह अपने आप धीरे-धीरे कम होती जाती है। शिक्षकों में बदलाव की कहानी का केंद्र बिंदु काम करना, बच्चों से संवाद करना और उनके सीखने की समस्याओं को पहचानना व समाधान करना ही है।
अपने काम के माध्यम से वे खुद अपने शिक्षण के अनुभवों पर विचार करते हैं। जहाँ-जहाँ चीज़ों का मशीनीकरण हो रहा होता है, उसको स्व-प्रयासों से मानवीय बनाने की कोशिश करते हैं। बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में आनंद आये और शिक्षक को पढ़ाने के बाद संतुष्टि का अहसास हो कि मैं जो पढ़ा रहा हूँ, वे बच्चे सीख रहे हैं। यह चीज़ जहाँ होने लगती है, शिक्षा व्यवस्था के स्थायी भाव को बदलाव की राह मिल जाती है।

बदलाव की चाह रखने वाले शिक्षकों का विरोध भी होता है

काम के प्रति प्रतिबद्धता और लगन के साथ काम करके विद्यालय में बदलाव लाने की कोशिशों की गति को भी रोकने की कोशिशें होती हैं। साथी शिक्षक ही कहते हैं कि अरे! सर आपको भी तो हम लोगों जितना ही वेतन मिलता है, क्यों इतनी मेहनत कर रहे हैं। आप तो पढ़ा रहे हैं, जो फलां संस्था से आ रहे हैं, केवल फीडबैक लिखकर, बच्चों का असेसमेंट करके और बात करके चले जाते हैं। अगर वे शिक्षक शिक्षामित्र या प्रबोधक (राजस्थान) हुए तो फिर पढ़ाने वाले शिक्षक को हतोत्साहित करने का कोई मौका ज्यादा वेतन पाने वाले शिक्षक क्यों चूकेंगे।
parenting-in-indiaविद्यालय में आने वाले ‘शिक्षक प्रशिक्षक’, या सुगमकर्ता के स्कूल से जाने के बाद वे संबंधित शिक्षक को घेरकर बैठ जाएंगे और कहेंगे कि अरे! आप क्यों परेशान होते हैं। कोई आपका क्या कर लेगा, क्यों परेशान होते हैं। एक ऐसी ही शिक्षक साथी ने कहा कि मुझे तो कम वेतन मिलता है, मैं इतनी मेहनत क्यों करूं?
मैंने कहा कि सर यह बात आपके साथी, आप और आपके कहने के बाद मैं जान रहा हूँ। मगर पहली-दूसरी कक्षा के बच्चे सच में नहीं जानते कि आपका वेतन कितना है? वे तो बस इतना जानते हैं कि आप हिंदी/गणित/अंग्रेजी/विज्ञान/ या सामाजिक विज्ञान पढ़ाते हैं। इसमें उनका क्या दोष है। ऐसे शिक्षक पढ़ाने का प्रयास करते हैं, मगर आलोचना की धुंध से सच्चाई की रौशनी में आने की राह सच में दर्द और तकलीफ से भरी हुई होती है, यह अब अच्छे से समझ में आता है। ऐसे में यह वाक्य कि शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते, ‘क्यों’ वाला शब्द जोड़े बिना पूरे नहीं होते।

‘क्या हम एक ऐसी समस्या का समाधान कर रहे हैं, जो कहीं नहीं है’

एक दिन एक शिक्षक के साथ मैं घर की तरफ वापस लौट रहा था, रास्ते में उन्होंने कहा, “देखिए सर, बहुत सारी योजनाओं को तो हम शिक्षक खुद कामयाब नहीं होने देते, अगर योजनाएं कामयाब हो गईं तो हमें रोज़ उसी तरीके से काम करना होगा। दरअसल शिक्षा व्यवस्था में कोई समस्या थी ही नहीं, सिवा काम करने के मन और जिम्मेदारी लेने वाले भाव के अभाव के। चीज़ें जैसी चल रही हैं, वैसी ही चलती रहें और अपनी सुविधा बनी रहे, इस भाव के कारण ही यही चीज़ पूरी व्यवस्था में फैल गई।”
उन्होंने आगे कहा, “बहुत से वरिष्ठ शिक्षकों ने नये शिक्षकों को सक्रियता और नयी ऊर्जा के साथ काम नहीं करने दिया। या फिर जिम्मेदारियां नहीं दीं। या फिर ग़ैर-शैक्षणिक कामों में लगाकर सारा उत्साह मार दिया। जब लोगों ने देखा कि शिक्षक के पास काम नहीं हैं और बच्चे सीख नहीं रहे हैं तो धीरे-धीरे शिक्षकों को ग़ैर-शैक्षणिक कामों में लगा दिया गया। बच्चों के सीखने के प्रति जवाबदेही लाने के लिए बनने वाले तमाम कार्यक्रमों के कारण शैक्षणिक प्रयोगों का एक सिलसिला शुरू हुआ जो औपचारिकताओं के कारण असफलता की देहरी पर चोटिल हो, समुद्र की लहरों जैसे वापस लौट गये। जो गये तो फिर किसी और रूप में लौटे, मगर किनारे की यथास्थिति ज्यों की त्यों बनी रही।”

‘उम्मीद अभी भी कायम हैं, इसलिए काम कर रहे हैं’

wp-image-1881994376उन्होंने कहा, “बीते कई सालों में जो बदला है सिर्फ भौतिक रूप में बदला है। इस बदलाव के साथ बहुत से बदलाव ऐसे भी हुए हैं, जो शिक्षकों को पसंद नहीं हैं। मगर इस स्थिति का आयात तो उन्हीं के अपने काम करने के तरीके और बनाई हुई व्यवस्था के कारण हुआ है। आज की तारीख में बहुत से विद्यालयों में भौतिक संसाधनों की उपलब्धता तो बढ़ गई। पहले के सरकारी स्कूलों में इतने संसाधन भी नहीं थे। उस समय लोगों की प्राथमिकता में बाऊंड्री वाल नहीं थी, मगर पढ़ाई अच्छी होती थी।”
उनकी बात का सार था कि बीते दशकों में बदलाव की वास्तविक भावना, जिद, कुछ हटकर करने की तमन्ना, युवावस्था का जोश और शिक्षक होने का जो गरिमामय अहसास था, वह कहीं खो गया। अगर कोई बदलाव संभव है तो उसी कुछ कर गुजरने के जज्बे और अहसास की बदौलत ही संभव है, जिसे फिर से ढूँढ लाने की जरूरत है। इस मोड़ पर अपनी बात समाप्त करते हुए यही कहने का मन हो रहा है कि एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों, इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
"अध्यापक की सोच" द्वारा प्रेषित

बुधवार, 2 मई 2018

Tools that can Help Teachers Design Great Lesson Plans

Tools that can Help Teachers Design Great Lesson Plans

03.05.2018

You have probably heard it one time too many but we will say it again: teaching is a huge responsibility. Shaping the younger generation's minds and preparing them for life outside the classroom is a tall order which becomes easier with proper research and planning. Moreover, you also need to find the balance between teaching the students what they need to know and giving them enough space to discover and learn by themselves. Feeding them with all the information they need can be quite tempting, but that will work to their disadvantage once they graduate from school. That's why it's important to come up with great lesson plans so you don't lose your way when you're teaching your students.

The quote “if you fail to plan, you plan to fail” rings true even for teachers. Lesson plans are prepared before each semester so teachers can visualize how to teach subjects, especially the difficult ones. It sounds glamorous, but the reality is that creating lesson plans is something that most teachers frown upon because it's a task that they find daunting. Why? Well, aside from teaching, they need to prepare the grades, assess the performance of the children, research about the next lesson, and design a lesson plan. These are the tasks that teachers juggle every single day. Fortunately, and all thanks to the innovations in technology, there are tools that can help teachers design great lesson plans! Their goal is to lift some load off the teachers' shoulders and help them come up with great lesson plans. To know more about them, read on:

Learnboost

 

Learnboost is an excellent reference for teachers who want to organize and construct their lesson plans. It's very simple, easy to understand and use, and teachers are given the freedom to customize the lesson plan. Learnboost also allows teachers to upload photos, videos, and other media files. This tool also allows them to track the progress of their students.

 

K-12 Reader

The K-12 Reader has a wide variety of lesson plan templates, activities, and worksheets that teachers can choose from. They can opt to go for multi-subject or unit specific templates for their lesson plans. For advanced students, K-12 Reader offers complex plans which gives flexible options to design lesson plans that will fit their needs.

 

Canva

 

Canva Lesson Plans are probably a surprise for you because you know Canva as a design tool but yes, you can also use it to create lesson plans. It has a vast array of templates and visual aids that you can use for that epic lesson plan. You can easily navigate through Canva's interface and the best part is, you can create your own images. It's like unleashing your inner artist while teaching your students. Awesome, we know.

Universal Design for Learning Lesson Builder

The UDL Lesson Builder gives the teachers the framework that will help them design lesson plans. This allows teachers to create lesson plans that are flexible when it comes to hitting the goals, materials, and assessment that are all crucial in helping the students. There are lesson templates too, for when teachers hit that block and find it difficult to move forward.

Google Docs

You may or may not be surprised to find that Google Docs can be used to create lesson plans. It has countless templates that teachers can use whenever they want. Google Docs also has weekly, monthly, and unit planners plus templates that are easy to customize. Creating lesson plans is a breeze with this tool.

Have Fun Teaching

You will definitely have fun teaching with this tool. It comes with printable templates that you can apply to different grade levels. Have Fun Teaching also has daily and weekly planners, plus templates on common core state standards. ESL and ESOL lesson planning? This one's for you.

If you find that you are running out of ideas on how to design your lesson plan, you can give Education Oasis a shot. Aside from the plethora of lesson plan templates, Education Oasis also offers resources, guidance, resources, and examples that are your disposal. All these can be applied for different grade levels.

Posted by : aks groups of series

रविवार, 22 अप्रैल 2018

'एकलव्य स्कूल' की 5 खास बातें क्या हैं ?

राजस्थान के आदिवासी अंचल में स्कूल जाते बच्चे।
भारत के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने साल 2018 के बजट सत्र में बोलते हुए कहा कि सरकार आदिवासी बहुत क्षेत्रों में ‘एकलव्य स्कूल’ खोलेगी।
सबसे ख़ास बात है कि एकलव्य के मॉडल स्कूल का आइडिया नया नहीं है, ऐसे स्कूल पहले संचालित हो रहे हैं, जिनको केंद्र सरकार विस्तार देना चाहती है।
एकलव्य की कहानी
एकलव्य एक मशहूर धनुर्धर थे, जिन्होंने अर्जुन को भी इस कला में परास्त किया था। उन्होंने जगंल में खुद से अभ्यास करके धनुष-बाण चलाना सीखा था, गुरु दक्षिणा के रूप में द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उनका अंगूठा माँग लिया था।
उपरोक्त घटना का जिक्र आज भी लोग गुरू द्वारा शिष्य के प्रति भेदभाव वाले व्यवहार को रेखांकित करने और एक शिष्य के लगन द्वारा खुद प्रयास करके किसी विधा में महारत हासिल करने वाली घटना के रूप में किया जाता है। सरकार उनके नाम को आदिवासी क्षेत्रों में पढ़ने वाले बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने वाली ‘एकलव्य मॉडल स्कूल’ बनाकर फिर से चर्चा में ला रही है।
एकलव्य मॉडल स्कूल की 5 ख़ास बातें इस प्रकार हैं
एकलव्य स्कूलों की स्थापना आदिवासी बहुत ब्लॉकों में की जायेगी, जहाँ की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी (20 हजार से अधिक जनसंख्या) आदिवासी समुदाय की है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान के सिरोही ज़िले के पिण्डवाड़ा ब्लॉक में ऐसे स्कूल खोलने की योजना है।

एकलव्य स्कूल आवासीय विद्यालय होंगे, जो नवोदय की तर्ज़ पर बनेंगे। नवोदय विद्यालयों में ग्रामीण और आदिवासी अंचल के प्रतिभाशाली बच्चों को प्रवेश परीक्षा में सफल होने के बाद कक्षा 6 में प्रवेश दिया जाता है और ऐसे बच्चे 6 से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करते हैं।

सरकार की मंशा है कि आदिवासी इलाक़ों से आने वाले बच्चों को उन्हीं के परिवेश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। 12वीं तक की शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने की सरकार की तरफ से क्या योजना है, इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

आदिवासी अंचल के बहुत से विद्यालय अकेले शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों में संसाधनों का अभाव है, ऐसे में इस तरह के विद्यालयों से आदिवासी अंचल में अच्छी शिक्षा मुहैया कराने के प्रयासों को गति मिलेगी।

इन विद्यालयों में आदिवासी अंचल की स्थानीय कला, संस्कृति, खेलों और कौशल विकास को बढ़ावा दिया जायेगा।

प्रेषित: अध्यापक की सोच

गुरुवार, 1 मार्च 2018

तकनीकी : कक्षा-कक्ष में कैसे पहुंचे जंगल के जानवर?

Posted by : aks groups of series

प्राथमिक विद्यालय भैंसी खतौली, मुज़फ्फरनगर से अपने क्लासरूम की यह तस्वीर शिक्षिका रीना मलिक ने साझा की है।

शिक्षा के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी की भूमिका को रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करने में उत्तर प्रदेश के शिक्षक भी पीछे नहीं हैं। वे नित नये प्रयोगों के जरिये कक्षा-कक्ष में बच्चों के अनुभवों को संपन्न बनाने के प्रयास कर रहे हैं। इस कड़ी में एक नया विचार है ZooKazam app के इस्तेमाल का। यह एप मुफ्त है, जिसे कोई भी शिक्षक मोबाइल पर डाउनलोड करके क्लासरूम में इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस एप के माध्यम से उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक साथी बच्चों को जानवरों की थ्री-डी छवियां क्लासरूम में मोबाइल के माध्यम से दिखा रहे हैं। इससे जुड़े अनुभवों को जब शिक्षकों ने फ़ेसबुक पर शेयर किया तो बाकी शिक्षकों ने भी जानने की जिज्ञासा जताई कि क्लासरूम में ऐसा कमाल कैसे संभव हुआ?

किताबों से बाहर आकर बच्चों से मिले जानवर

शिक्षिका रीना मलिक ने क्लासरूम में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के अनुभव साझा किये।

इस एप के माध्यम से आप चींटी जैसे छोटे से जानवर से लेकर जुरासिक काल के बड़े जानवरों की छवियों को क्लासरूम में दिखा सकते हैं। इस एजुकेशनल एप को एवार्ड भी मिल चुका है। इस एप के सीईओ मार्जन यावरी कहते हैं कि यह एप जीव जगत के बारे में ज्ञान व समझ को साझा करने की दृष्टि से काफी उपयोगी है।

‘मैम ये जानवर तो तो सच में आ गए’

बच्चों को अपने शिक्षक का यह प्रयोग काफी पसंद आया।

इस एप के माध्यम से ध्रुवीय भालू, सफेद शार्क, घोड़े, हिरन जैसे बहुत से जानवरों और पक्षियों की छवियों को क्लासरूम में उकेरा जा सकता है। बच्चे इस दौरान भरपूर आनंद उठाते हैं और अपनी जिज्ञासा को शांत करते हैं। इस एप के अपने क्लासरूम में प्रदर्शन के अनुभवों को फ़ेसबुक पर साझा करते हुए शिक्षिका रीना मलिक कहती हैं, “बच्चों की प्रतिक्रिया थी, मैम ये तो सच में आ गए।”

एजुकेशन से जुड़े एप के बारे में शिक्षिका रीना मलिक अन्य शिक्षकों को भी जागरूक कर रही हैं।

इस एप का ट्युटोरियल देखकर शिक्षकों द्वारा कक्षा-कक्ष में इसका इस्तेमाल करना, एक सराहनीय प्रयास है। इसके बारे में अन्य शिक्षकों से अपने अनुभव साझा करते हुए रीना मलिक कहती हैं, “पहले जानवरों की छवियों को रंगीन सतह पर बनाएं और उसके बाद उनको धीरे-धीरे जहाँ भी ले जाना चाहते हैं उस तरफ ले जाएं। इसी नाम के कई सारे एप हैं, जिनके माध्यम से क्लासरूम में ऐसा किया जा सकता है।”

यह तस्वीर ट्विटर पर शिक्षिका नम्रता वर्मा ने शेयर की है, जिसमें बच्चों के चेहरे पर हैरानी का भाव साफ-साफ पढ़ा जा सकता है। वे लिखती हैं, “P.S. Unasi Bareily-Lil kids of class 1 & 2 experiencing d real wildlife in classroom…felt so excited inside d class..my 3D ICT based class.”

शिक्षकों के बीच हो रही है ‘पियर लर्निंग’

शिक्षकों द्वारा सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक-दूसरे से सीखने और एक-दूसरे की मदद के लिए करने वाले ऐसे प्रयास आने वाले दिनों के लिए एक अच्छा संकेत हैं। जो शिक्षकों को आपस में जुड़ने और अन्य विद्यालय में नवाचार करने वाले शिक्षकों के अनुभवों से रूबरू कराने का जरिया बन रहे हैं। आप भी अपने मोबाइल के एप स्टोर में जाकर इस एप को डाउनलोड कर सकते हैं और अपने आसपास मौजूद किसी शिक्षक साथी से उसे इस्तेमाल करने का अनुभव हासिल कर सकते हैं।